हम विकास के हकदार ही नहीं
हमारे शहर में मेरे घर के पास रंगरोगन हुआ, मै वहाँ से गुजरा और विकास होता देख बहुत खुश हुआ. तभी एक महाशय वहाँ से गुजरे और नइ नवेली सफेद पट्टीयों को बिगाड कर चले गये, जबकी पास ही खाली जगह थी निकलने की. बडा गुस्सा आया. हम लोगों को परवाह ही नही है.
कहते है नगरपालिका सफाई नहीं सखती और तभी पान की पीक भी मार देते है. कहते है ट्रेनो मे कितनी गंदगी है और तभी नास्ता करके प्लेट भी वहीं गिरा देते है. यहाँ वहाँ थूकना तो आम बात है. कचरे के डिब्बे के पास कुडा डाल देते है पर डिब्बे मे नही डालते.
हम लोगो मे जागृति का अभाव है. पुलिस ना हो तो ट्राफिक सिग्नल तोड देते है. हम खडे रहे, हमारी लेन खुलने का इंतजार करे तो यूँ घुरते है कि जैसे कोई गुनाह कर लिया हो. सोचता हूँ, क्या हम विकास के हकदार है भी?

2 Comments:
mera naam
hi
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