10.7.06

दिल्ली चार साल बाद चार दिन

कुछ दिन पहले मैरा दिल्ली जाना हुआ. चार साल बाद जा रहा था. राजधानी के बदले स्वरूप को देखने की तथा अपने ब्लोगर बन्धुओं को मिलने की अदम्य ईच्छा के साथ में ट्रेन में सवार हुआ.


हालाँकि मैरा दौरा अतिव्यस्त रहने वाला था. फिर भी मैने तय कर रखा था कि जो भी हो तीन चीजें तो करनी ही है.

1. मेट्रो में सफर करना
2. अक्षरधाम मन्दिर जाना
3. ब्लोगर बन्धुजनों से मिलना

दिल्ली पँहुचते ही शाम को अमित से मिला. वो भी जल्दी में था, मै भी. आगे शांति से मिलने का वादा करके वो निकल लिया. फिर दो दिन ससुराल पक्ष की शादी, मैरे क्लाइंट से मिलने में निकले गए. इस बीच मेट्रो में काफी सफर किया.

पहले दिन पश्चीम विहार से दरिया गंज बस में गया, और आग झरती गर्मी के बीच खुद को रोस्टेटे पापड सा पाया. डेढ घंटे के सफर के बाद जब एक क्लाइंट के पास पँहुचा तो तपेदिक का मरीज लग रहा था. वो साहब बोले "कैसे आए?" मैने कहा "बस से". वो मुस्कुराए, मन ही मन बुदबुदाए - अजीब बेवकुफ इंसान है. बोले "मेट्रो से आ जाते". मैने कहा "रूट पता नही था". वो बोले "अभी बता देते हैं". वापसी में ऑटो फिर मेट्रो फिर ऑटो से घर आया. जाते समय लगे थे डेढ घंटे आते समय लगे 20 मिनट. जाते समय लगे थे 11 रूपये, आते समय लगे 90 रूपये. पर फिर भी खुश था. सुखी था.

आगे के सारे सफर ऑटो फिर मेट्रो फिर ऑटो से ही किए. रास्ते में बस में सवार लोगों को देखता और कहता "अजीब बेवकुफ हैं" फिर सोचता भाई 11 रू. और 90 रू. में काफी फर्क है.

मंगलवार को जाते जाते सभी ब्लोगर बन्धुओं से दुआ सलाम भी कर ली.

तो कैसी लगी दिल्ली भाईसाहब?

क्या कहें. अहमदाबाद से दो गुना बडे इस महानगर की लीला निराली है. क्या फ्लाई ओवर हैं. दिल बाग बाग हो जाए. ऐसे घुमावदार फ्लाई ओवर कहीं ना देखे. हमारे यहाँ तो एक अदने से फ्लाई ओवर का उदघाटन करना हो तो भी अडवाणी जी उडते चले आएँ, और वहाँ तो गली गली में फ्लाई ओवर ही फ्लाई ओवर है.



क्या मेट्रो ट्रेन है. अचम्भीत हुआ बस देखे जाता हुँ. राजीव चौक का स्टेशन तो जैसे नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से भी बडा है. बस अब इंतजार है कब अहमदाबाद में भी मेट्रो चले. दो रूट निर्धारीत हो चुके हैं, डिटेल रीपोर्ट बन चुकी है. बस केन्द्र सरकार हरी झंडी दिखा दे. हालाँकि उम्मिद कम है जब तक यु.पी.ए. सरकार है.




क्या अक्षरधाम है. वाह वाह. हमारे अक्षरधाम जितनी तो शायद पार्किंग होगी वहाँ. अद्भूत, आश्चर्य, अनोखा, अपूर्व, आलौकिक, अक्षरधाम.




बहुत तारीफ सुन ली अब ये भी सुनो.

ये क्या चार चार घंटे लाइट ही नही है. एल्लो हमारे यहाँ तो कभी बिजली जाती ही नही. हमे तो पता भी नही लोड शेडिंग क्या होता है.

और यह यमुना है कि नाला है. कभी साबरमती में बहते नर्मदा के पानी को देखा है? :-)

और लोग. तौबा. क्या घटिया स्वभाव है. यार ये लोग इतने चिड चिडे क्यों है. लगे जैसे मार खाकर आए हों. कोई सिधे मूँह बात ही नही करता.


खैर कोई नही. दिल्ली देश का दिल है. सही है ना?

7 Comments:

Blogger Sagar Chand Nahar said...

बहुत बढ़िया तरीका है पहले तो मिठाई खिलाई बाद में करेले का रस भी पिला दिया। पहले तारीफ़ और बाद में खिचांई!!!!

12:32 PM, July 10, 2006  
Blogger Pratyaksha said...

ये तरीका बढिया लगा

5:14 PM, July 10, 2006  
Blogger Manish Kumar said...

कुछ मीठा कुछ खट्टा ! :)

6:41 PM, July 10, 2006  
Anonymous Anonymous said...

Shabash kafi uchit likha!

7:15 PM, July 10, 2006  
Blogger पंकज बेंगाणी said...

"Shabash kafi uchit likha!"
साधारण सी बात कही आपने फिर Anonymous क्यों रहे.

सागर भाईसा, प्रत्यक्षाजी, मनीषभाई धन्यवाद

7:32 PM, July 10, 2006  
Blogger ई-छाया said...

राजधानी की सैर करने व कराने हेतु धन्यवाद।

1:02 AM, July 11, 2006  
Blogger प्रेमलता पांडे said...

दिल्ली लघु भारत है।
-प्रेमलता पांडे

1:50 PM, July 11, 2006  

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