13.7.06

डरपोक देश : भ्रष्ट राजा : निष्क्रिय प्रजा

जब से मुम्बई में फिर से धमाके हुए हैं, हम सब अन्दर तक हिल गए हैं. परिचर्चा में थ्रेड पर थ्रेड खुलते जा रहे हैं. कौई सेक्युलरों को गालीयाँ दे रहा है, कोई मुसलमानों की वकालत कर रहा है. कोई कहता है आंतकवादीयों का धर्म नहीं होता, कोई कहता है धर्म ही आंतकवाद फैला रहा है. विचार अनेक, मत अनेक, सोच अनेक, पर चोट एक. सब घायल हैं. क्यों, घायल हैं?
  • डरपोक देश:

    हमारा महान भारत देश क्यों डरपोक लगता है? यह कोई आज की बात नही है. सदीयों से चला आ रहा है. कभी कोई महमुद घोरी आता है, सोमनाथ लुट जाता है. कोई रोकने वाला नहीं. भगवान के रखवाले सोचते हैं, भगवान रक्षा कर लेंगे. खुशफहमी मे रहते हैं, और कोई घोरी भगवान को लूट कर ले जाता है. और वो रूकता नही, बार बार आता है. बार बार लूटता है. अब कोई खुशफहमी नही, पर कोई निति भी नही. कोई सुरक्षा भी नही.

    कभी मुगल आते हैं, कभी अंग्रेज, कभी पुर्तगाली, गुलाम बना लेते हैं, लुट कर ले जाते हैं. क्यों? क्योंकि हममें ही एकता नहीं थी, नहीं है. तभी तो हम सोफ्ट टार्गेट बने हुए थे, बने हुए हैं.

    चलिए ज्यादा दूर मत जाइए. बांग्लादेश से आते थोकबन्द लोग तो दिख रहे हैं. एक भिखारी देश के सरदर्द भारत के लिए नासूर बनते जा रहे हैं. पर उनके वोटों पर पलने वाली सरकार को कुछ नही दिखता. दिखेगा भी नहीं, जब तक यह नासूर घाव नही बन जाएगा. पर तब तक बहुत देर हो जाएगी.

    कुछ साल पहले अखबारों में तस्वीरे छपी थी कि कैसे बांग्लादेश राइफल के जवान भारतीय जवानों को मारकर सुअरों की तरह लटका कर ले जा रहे थे. क्या किया था भारत ने. वस्तुत: प्रत्यक्ष तौर पर कुछ नही. जब यह अदना सा देश इतनी हिम्मत कर सकता है तो दुसरों का कहना ही क्या?

    कारगील युद्ध याद है. कितनी बडी चुक. एक ऐसे देश पर भरोसा करके पैरों पर कुल्हाडी मारी जिसकी दोस्ती का "स्वर्णीम इतिहास" काफी कुछ कह जाता है. और फिर हाथ आया मौका भी गवाँ दिया.

    रिपोर्टस कहती है, भारत सरकार ने एल.ओ.सी. पार नही कि, क्योंकि डर था कि परवेज़ मुशर्रफ परमाणु हथियारों का विकल्प अपना सकते हैं. "डर" था. हमको डर था. पाकिस्तान को क्यों नही. क्या भारत के पास परमाणु हथियार नहीं हैं. फिर भी डर था. और सैनिकों को मरने दिया, पर एल. ओ. सी. पार नही कि. कम से कम सीमा पार के आंतकवादी शिविर ही नष्ट कर देते. एक बार का डर तो बैठता. पर मौका चुक गया. क्यों? क्योंकि सरकार को डर था.

    आज ही आज यह डर था! इनसे तो इन्दिरा गान्धी अच्छी थी. पाकिस्तान के दो टुकडे तो कर दिए. कभी सोचता हुँ, काश कारगील के दौरान इन्दिरा प्रधानमंत्री होती.

    हम हमेंशा शांति शांति का राग अलापते रहते हैं, और पडोसी लुट कर ले जाते हैं. सब ठीक है, पर हद से ज्यादा नही. नेहरू भी शांति का राग अलापते थे और चीन जमीन ले गया. क्या मिला हमें?

    आंतकवादी प्लेन अपहरण कर ले जाते हैं. दिल्ली उतरते हैं, अमृतसर उतरते हैं. और हम गफलत में रहते हैं कि क्या करें? सी.सी.एस. की मिटिंग होगी, निर्णय होगा, एन.एस.जी. को बुलाएंगे कि नही बुलाएंगे?, सोचते रहेंगे और वो उड जाएंगे. लाहोर से रिचार्ज होकर कन्धार पहुँच जाएंगे, और सरकार क्या करेगी? फिर से डर. अब देश के लोगों का डर. हमारे विदेश मंत्री आंतकवादीयों को सी ऑफ करने जाएंगे. और वो टोपीवाला अज़हर मसुद तीन दिन बाद ही पाकिस्तान मे दिखेगा. कोई बता सकता है, उसके बाद उसके इशारों पर कितने लोग मरे हैं?

    क्यों? आखिर क्यों. भारत क्यों डरपोक लगता है?

जारी........

4 Comments:

Blogger Jagdish Bhatia said...

पंकज भाई, टोपी वाले का नाम अजहर मसूद है।;)

8:20 PM, July 13, 2006  
Blogger Sagar Chand Nahar said...

पंकज भाई
अगर आपका इशारा अगर मेरी तरफ़ है तो मैं बता दूँ कि मैने मुसलमानों की वकालात नहीं की, मैने सिर्फ़ कट्टरतावाद का विरोध किया है।
कट्टरता चाहे मुस्लिम करें,हिन्दू करें या ईसाई; वह हमेशा गलत ही रहेगी।
मैं यह नहीं कहता कि हमें चुप रहना चाहिये बिल्कुल आतंकवादियों और पाकिस्तान को सबक सिखाना ही चाहिये, उसके लिये साम, दान, दंड और भेद जो तरीका अपनाया जा सके वो अपनाना चाहिये।

10:17 PM, July 13, 2006  
Blogger पंकज बेंगाणी said...

धन्यवाद भाटियाजी.

सागर भाईसा, मैने व्यक्तिगत तौर पर किसीका नाम नही लिया. मै नही मानता आपने किसी सम्प्रदाय विशेष की वकालत की है. वास्तव में आप बहुत अच्छे सहृदय इंसान हैं. आपकी सोच उचित है.पर हद से ज्यादा सहिष्णुता कायरता है.

9:24 AM, July 14, 2006  
Blogger Basera said...

भाई, 'लुट' को 'लूट' कर लीजिए, 'लूट कर ले गए'।

3:57 PM, July 23, 2006  

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