28.10.06

आजा लौट के आजा मेरे मीत.........

क्या कहुँ... सब सुना सुना है। गुजरात का भी बडा भारी काम है भाई। दिवाली क्या आई... सब भाग गए। छुट्टियाँ जो आ गई। दिवाली के बाद लाभ पंचमी तक सब बन्द।

सब बन्द यानि सब बन्द। पुरे हफ्ते ऐसा लगता है जैसे शहर में कर्फ्यु लगा है। सडकें सुनी, दुकानों मे ताले... और जीवन के लाले। सच में लाले पड जाते हैं।

अब दिवाली के पहले बीवी के गले में दर्द उठा तो भागे डोक्टरनी के पास कि कहीं वो भाग ना जाए। पहुँचते ही मुस्कुराई कि अच्छा हुआ आज आ गए। मैने कहा हम समझ गए.. आप तो चले छुट्टी पर। वो बोली सही समझे, अब एक काम करो हफ्ते भर की दवाई ले लो। हम तो ये चले कि वो चले।

मैने खैर मनाई कि चलो अच्छा है आज ही बीवी बिमार पड गई, कल कहाँ डोक्टर बाबु ढुंढता।

और दुविधा तो हो ही गई आखिरकार... बीवी नहीं तो एक रिश्तेदार बिमार पड गए और डोक्टर तो ढुंढे ना मिले। सब गायब। अब बिमारी भी कोई बडी तो थी नही कि भई अपोलो वपोलो ले जाएँ... खैर किसी तरह काम निकाल लिया।

शुक्रवार को लाभ पंचमी थी तो लगा चलो अब सब काम पर लौट आएंगे तो ये क्या... सब बन्द। अरे क्या हुआ तो पता चला कि भई वैसे ही वीकएंड आ रहा है तो क्यों ना सोमवार से ही लौटा जाए।

धन्य है प्रभु। करे तो क्या करें। हमारे जैसे बुद्धु ऑफिस खोल कर पडे हैं तो काम में मन नहीं लगता, लगे कहाँ से जब सब छुट्टि मना रहे हों तो।

हम गुजरातीयों का भी कमाल है भाई, कमाते भी हैं तो जिन्दगी का आनन्द भी ले लेते हैं।

लगे रहो।

6 Comments:

Blogger गिरिराज जोशी said...

हमारे जैसे बुद्धु ऑफिस खोल कर पडे हैं तो काम में मन नहीं लगता, लगे कहाँ से जब सब छुट्टि मना रहे हों तो।


हम भी बे-मन ही टिप्पणी कर रहें है ॰॰॰

आप पहले से ही अकेलापन फील कर रहे हैं और ऐसे में अगर हम बिना टिप्पणी किये खिसक लेते तो क्या पता आप सारा गुस्सा हम पे दे मारते? हम आपका गुस्सा ना झेलना पड़े इससे अच्छा है कि बे-मन ही सही टिप्पणी कर दी जाए। :)

1:48 PM, October 28, 2006  
Blogger Pratik Pandey said...

क्यों दफ़्तर में बैठे हो भई? आप भी निकल लेते बंद करके घूमने के लिए :-)

6:56 PM, October 28, 2006  
Anonymous Anonymous said...

शायद इसी लिए गुजराती चिट्ठों पर घूमने चल पडे ;)
आपके गम मे बराबर का शरीक हूं - क्योंकि आपकी और मेरी छुट्टी का हाल यही हुआ :( ;)

8:15 PM, October 28, 2006  
Anonymous Anonymous said...

हाए बिचारे पंकज भाई
शायद इसी लिए गुजराती चिट्ठों पर घूमने आए ;)
आपके गम मे बराबर का शरीक हूं - क्योंकि आपकी और मेरी छुट्टी का हाल यही हुआ :( ;)

8:18 PM, October 28, 2006  
Blogger Udan Tashtari said...

चलो, अब तो लगभग कट ही गई, जो बची है सो भी कट ही जायेगी.
:)
शुभकामनायें.

11:02 PM, October 28, 2006  
Anonymous Anonymous said...

अरे भईया का बताएँ, हमरा हाल भी तोहार जैसन है। अब हमार बीवी तो है नहीं, सो हम ही बीमार पड़ गए। लेकिन ई अच्छा हुआ कि यहाँ डॉक्टर दीपावली की रात के अतिरिक्त बाकी दिन उपलब्ध था। ऊ हमका ई याद दिलाए कि दवाईयाँ भी बहुत महँगी हो चली हैं, इस महीना में दीपावली, रिश्तेदारी में शादी और ईब यह मुई बीमारी, सबहो मिल हम गरीब की खाट खड़ी कर देई!! तो समझ सकते हैं, हमका भी आप के साथ ..... ऊ का कहत हैं ..... हाँ ..... sympathy है।

1:28 AM, October 29, 2006  

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