छः बजे का सिक्सर
सबसे पहले तो भाई बता दुँ कि छः बजे का सिक्सर होता क्या है।
यह मेरा ईजाद किया हुआ जुमला है, जिसके पीछे एक थ्योरी है। छः बजे मेरी एक अवस्था होती है। दिन भर के काम, टेंशन और पक जाने के विभिन्न चरणों के पश्चात दिमाग का दही हो जाए तथा खोपडी मे अगडम बगडम चालु हो जाए तब छः बजे का सिक्सर सुझता है। इस समय अँट शँट बातें चलती है और भाषा भी थोडी नाकाबिले बर्दास्त और फुहड हो जाती है। आ हा हा... अपने को इस अवस्था में हिस्टोरीकल आइडियाज आते हैं।
ऐसा हर दिन हो जरूरी नही है, पर अमुमन हो यह नियति है।
आज का सिक्सर:
आज मेरी खोपडी में मन्नु घूम रहा है। बोले तो अपने प्रधानमंत्री। आहा.. क्या चाल है। कल न्यूज़ में चलते देखा था। क्या नज़ाकत है। और उनकी आवाज़ सुनी है क्या.. बोली भी बडी मीठी है यार... एकदम... .. जैसी। नहीं!!? की मैं झुठ बोलियाँ... ना जी.. :)
और उनके साथ सोनिया हो तो देख लो उनको भी.. क्या ठस है यार। असली प्रधानमंत्री तो वही लगती हैं। अब हकिकत तो सबको पता है, बोलने की जरूरत क्या है?
बात अपनी यह है कि प्रधानमंत्रीजी थोडा रोबदार हो तो वट्ट पडे ना। अपने तो यार बहुत नाजुक किस्म के हैं। सोलिड होना मांगता है। सज्जन हैं माना, ज्ञानी है वो भी माना, ईमानदार हैं सवाल ही नही है... बिल्कुल है, पर प्रधानमंत्री नहीं लगते। अब मैं कौन होता हुँ बेमतलब आग लगाने वाला। भाई बात यह है कि 150 करोड लोगों में से एक मैं भी हुँ ना यार। तो अपने को प्रधानमंत्री चुज़ करने का हक है कि नहीं। प्रत्यक्ष करने को मिले तो दि बेस्ट... पर ऐसा तो अमरीका वाले करते हैं। सिधा डायरेक्ट एंट्री।
अभी बोलो अपने देश में ऐसा हो तो? मज़ा आ जाए.. राष्ट्रपति प्रणाली हो तो।
चलो बोलो कौन केंडीडेट होगा।
नरेन्दर मोदी : ह्म्म... बापु गुजरात में तो कोई सामने खडा होने की हिम्मत करेगा नहीं। और महाराष्ट्र, राजस्थान भी फतह कर लिया समझो। पर बंगाल में कि होगा दस्सो... और साउथ भी... रहने दो भाई।
सोनिया : यु.पी. ले ले... बिहार दिया... साउथ भी चल दिया... पर गुजरात.. ही ही ही
मुलायम : यु.पी. बस बहुत है
अटलजी : अरे दादाजी अब आराम करो
अडवाणी : रथ ले के घुमो तो पता चले बाकि दो चार राज्य में तो ठीक बाकि का पता नहीं
लालु : बिहार में थोडा थोडा देश में पर नाकाफी...
अपने कम्युनिस्ट भाईलोग में से कोई भी एक नंग : बंगाल ले लो भाई बहुत है....
और अपने मनमोहन : ही ही ही... मजाक नहीं.... बुरा लग सकता है....
अरे यार कोई मास लीडर है कि नहीं...????

8 Comments:
मास लीडर के दिन लद गए उस्ताद.. पत्रिकाएं पलटता हूं तो सोनिया आगे दिखती है. पीछे देखता हूं तो अटल दद्दा ऊंघते बैठे हैं. गठबंधन के दौर में अब मास वगैरह को कोई नहीं पूछेगा. लिहाज़ मास ने भी लीडर चुनना छोड़ दिया है. मास जब तक एक-दूसरे का मांस नोचना बंद नहीं कर देती तब तक लीडरशिप का टोटा बना रहेगा.
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:)
कलम में पैनापन आने लगा है छोटे नवाब!!या किसी और की कलम (की बोर्ड) से लिख रहे हो।
इस लिस्ट में हमारा नाम भी लिख देते क्या हर्ज था, अरे जब देवग.... माफ़ी चाहता हूँ जब देव्ह्गौड़ा परधानमंतरी बन सकते हैं तो हम काहे नहीं।
वैसे मुशर्रफ़ साहब के बारे मे क्या राय है आपकी.
लेख वाकई मज़ेदार है! :)
Its difficult to view your blog in Firefox and Mozilla thunderbird as well (win XP). I cna see it in properly in firefox in Linux.
डॉ कलाम।
छः बजे का सिक्सर तो बड़ा सालिड है. हो बहुत पुराने विचारों वाले, जो इस नये उमंगित जमाने में मास लिडरशिप की बात कर रहे हो. :)
बहुत परेशान मत हो, कोई न मिले तो बताना, मैं हूँ न!
नीरजबाबु,
मास लिडर नहीं तो कोई खाश लिडर तो मिले! मनमोहन जैसे दास लिडर क्यों?
भाईसा,
की बोर्ड तो मेरा ही है.. वो छः बजे मेरी खोपडी मे कुछ कुछ होता है उसका असर है
अनुराग दादा,
मुशर्रफ चोर है, उसके जैसा पाखंडी नही चाहिए अपने को तो, अब तो झुटा कपटी और नामाकुल भी हो गया है।
राग,
तो फायरफोक्स में काहे देखते हो.. आई.ई. में देखो भाई। :) फायरफोक्सवा मजेदार नही है.. बहुत लोचा मारता है।
और लाले दी जान,
आपको परदानमंतरी नही ना बनाएंगे... कुण्डली फुण्डली लिखते रहोगे सारा दिन... कौनो काम धाम नही करोगे। फायलों का ढेर लगा दोगे.. ना बाबा ना।
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