छः बजे का सिक्सर : लडाई झगडा माफ करो
भाई लडाई झगडा माफ करो और गान्धीजी को याद करो।
हम तो माफी मांगते हैं भाई, एक हमरे जैसे ठोकमठोक करने वाले बन्धु के बलोग पर टिप्पणी रूपी धुरन्धर प्रसाद चढा आये थे, वक्त था शाम के छ: बजे। ए ल्लो.. भाई पहले ही नही ना कहे थे कि छ: बजते ही हमरी खोपडीया में केमिकल लोचा स्टार्ट हो जाता है.. तो हम का करी?
चलो भाई सारी जात बिरादरी के सामने पंच परमेशर को हाजिर नाजिर मानकर हम छमा मांगते हैं, दिंल से, कोई सिक्सर नहीं।
अब कल रिपोटर भाई नीरज से वार्तालाप किए रहे..... अब वो भी ना .... हमको पकडे छ: बजे। लो हो गई रामकथा। लगा दिया सिक्सर.... वो बोले भाई देख कर लिखो जरा... बुरा लग जावेगा। बस खोपडी भभक गई हमरी। हम तो कह दिए जो जी में आवेगा हम तो कहेंगे। कोई हमरे भाईसाब को भी तो कहत रहा। हम काहे नही कहें। वो बिचारे का कहते, बोले ठीक है फिर जो जी में आए करो।
ब्रदर, हमको है ना सुबह रियालायज हुआ रहा, कि भाई लोचा है। खोपडी कूल तो मानी हमने भूल। हम काहे बुरे बने। हमतो क्यूट बोय ही अच्छे, है कि नहीं?
तो भाई हमसे भूल हुई तो छमा किज्यो। उ का कहते हैं मिच्छामी दुक्कडम।

3 Comments:
हम काहे बुरे बने। हमतो क्यूट बोय ही अच्छे, है कि नहीं?
सही कह रहे हो. बाकी तो सब समय के साथ निपट जाता है. एक बड़ा परिवार है हिन्दी चिट्ठाजगत, तो थोड़े बहुत मतभेद तो चलते ही रहेंगे. इसमे क्या बुरा मानना.
भई, किसी को बुरा लगे ना लगे.. अपने को नहीं लगता है. याद करो ज़रा परिचर्चा में कितनी गालियां खाई हैं अपन ने शुरू शुरू में. ही ही.. लिखते रहो.. मतभेद ठीक है.. मन का भेद नहीं हो. सलाह तो अपन ने तुम्हें अपना क़रीबी समझकर दे दी थी.
"सलाह तो अपन ने तुम्हें अपना क़रीबी समझकर दे दी थी."
आपकी सलाह सर आँखो पर।
"इसमे क्या बुरा मानना"
होते हैं, हो जाते हैं खफा,
मनाना पडे है हर दफा।
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