15.2.07

पातालभैरव: सत्ता की चासनी

[अगर आप पातालभैरव सिरीज के नए पाठक हैं तो पहले पात्र परिचय पढें]

अन्धेरी दुनिया में कहीं.....

दाऊ इमरीत वो कार्य कर रहा था जो उसकी नजर में जीने के लिए नियाहत जरूरी था, वो पी रहा था.
छोटा वकील: लंगडे का सुना...
दाऊ: क्या सुनना है, बोल दे...

वकील: जीत गया स्साला... सुना है मुंसीपाल्टी जीतने वाली पार्टी को समर्थन भी देगा..
दाऊ: कित्ते है एम.एल.ए.?

वकील: पता नहीं पर कुछ तो होंगे नही तो समर्थन किसका देगा?
दाऊ: हट.... फिर रौब झाडता फिरेगा अपने को, यह स्साली सत्ता भी उसके जैसी होती है, लंगडी!

वकील: लंगडी?
दाऊ: हाँ लंगडी, कभी ठीक से नहीं चलती दो चार बैसाखीय़ाँ लेगी तो भी गिर जाएगी...

वकील: ह्म्म्म, ना दाऊ, सत्ता नहीं, सत्ता चलाने वाले लंगडे होते हैं! देखो... कितनों के कन्धे पर हाथ रखते हैं, कितनी बैसाखीय़ाँ बगलों में ठुंसे घुमते हैं, फिर भी स्साला सर पर इतना बोझ होता है कि गिर जाते हैं।
दाऊ: ऐसा!! तो ये लंगडा भी गिरेगा क्या?

वकील: वो तो पहले से ही गिरा हुआ है, वो क्या गिरेगा?
दाऊ: हा हा हा, गिरा हुआ लंगडा, वो तो अमृतांजन के सामने चुरण पर गिरता है।

वकील: अस्सल नेता है, जनता के सामने ईमानी छोड बेईमानी पर गिरता है। नहीं..
दाऊ: सही बोलता है तु, और जनता अपना थोबडा नहीं खोलती...

वकील: काइको दाऊ, स्साला चुप क्यों रहने का?
दाऊ: क्योंकि जनता अमृतांजन जैसी है, उसको पता है कि वो नाम का राजा है, अस्सल सत्ता किसके पास है? लंगडे के पास, लंगडा भले लंगडा है पर नेता वही है।

वकील: और चुरण "सत्ता" है?
दाऊ: हाँ, वही सत्ता है, उसीको पाने की लडाई है। वो वास्तव में रखैल है!

वकील: नेता की?
दाऊ: नहीं, ताकत की! सत्ता ताकत की रखैल होती है, वकील... समझा?

वकील: मुझे तो वो चासनी जैसी लगती है?
दाऊ: कौन? चुरण?

वकील: (आँख मारते हुए) सत्ता!
दाऊ: चासनी बोले तो?

वकील: बडी मिठी होती है, कितना भी चाटो पियास बुझती ही नहीं!
दाऊ: तो स्साला.. पी जाने का, मेरे जैसे... हीक..

वकील: नहीं... सत्ता चासनी है दाऊ, चाटो तब तक ठीक है, पी जाने से डायबिटीस हो जाता है।
दाऊ: हा हा हा, लंगडा खूब जानता है, सत्ता चाटता है, पीता नहीं....

वकील: अस्सल नेता... स्साला!

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अन्धेरी दुनिया का दुसरा छोर... (लंगडा लवली और चुरण देवी)

चुरण: तु रोज आता है, अमृतांजन को पता चला तो दोनों को मारेगा।
लंगडा: पता है उस्कु, पण पहले खडा होना तो सिख ले फिर ना मारेगा!

चुरण: (चौंक कर) पता है उसको? फिर कुछ बोलता क्यों नहीं?
लंगडा: हट... पता है बुढवु को, वो खाली रबड स्टेम्प है, असली स्टेम्प पेपर मइ है..

चुरण: हट नफ्फट, तो उसको सलाम काइको बजाता है, ठोक दे मौका देखके...
लंगडा: बावळी है तु, अपने को काइको टेंशन लेने का, नाम उसका ही रखो, पण सेवा का मेवा अपने को खाने का.. समझी!!

चुरण: अस्सल नेता... स्साला!

7 Comments:

Blogger ePandit said...

भाई सुरेन्द्र मोहन पाठक की आत्मा आ गई आपमें तो बिल्कुल। :) मैं तो बोलता हूँ ५० पोस्टें पूरी होने पर नॉवल छपवा लो, खूब बिकेगा।

अगली कड़ी का इन्तजार है, बाकी लोग क्या बिसात खेलते हैं।

10:44 AM, February 15, 2007  
Blogger Divine India said...

पहले भी कहा था अब-भी कहता हूँ बिल्कुल चित्रित करता यह Script है…लगे रहे…बधाई!!

2:53 PM, February 15, 2007  
Blogger Pratyaksha said...

पूरी फिल्मी स्क्रिप्ट है । बहुत बढिया

4:55 PM, February 15, 2007  
Blogger पंकज बेंगाणी said...

श्रीश,

धन्यवाद.
नहीं यार, सुरेन्द्र मोहन जैसी कहाँ लिख पाउंगा, मैं तो बस कोशिश कर रहा हुँ. नोवल तो छपवा लुंगा, और शायद तीन ग्राहक भी जुगाड लुंगा, एक भाई, एक लालाजी और एक आप.. आगे तो कोई लेवाळ नहीं है अपना तो.. :)

द्वियाभजी,

धन्यवाद. पर मैं आपकी टिप्पणी पुरी तरह से समझ नहीं पाया.

प्रत्यक्षाजी,

आपकी टिप्पणी मिलना सौभाग्य समझता हुँ, धन्यवाद.

6:13 PM, February 15, 2007  
Blogger Udan Tashtari said...

बस लिखते चलो, सिरियल की स्क्रिप्ट तैयार हो रही है. हम तो किताब भी खरीदेंगे और सिरियल भी बनायेंगे. :)

6:56 PM, February 15, 2007  
Blogger Sagar Chand Nahar said...

भैया वो किताब छप जाये तो Demo Copy इधर भी भेज देना।
आगे की कहाणी का इंतजार है।

7:58 PM, February 16, 2007  
Anonymous Anonymous said...

भैया वो किताब छप जाये तो Demo Copy इधर भी भेज देना।
श्रीष जी ने हमारी टिप्पणी की नकल मारी है, आपको सुरेन्द्रमोहन पाठक हमने घोषीत किया था।

5:05 PM, February 19, 2007  

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