तब और अब - हैरतअंगेज़ फर्क
इस तस्वीर में क्या खाश है?
एक आदमी साइकल पर कुछ ले जा रहा है. सामान्य सा लगने वाला यह दृश्य असामान्य घटना से जुडा हुआ है. ये आदमी अपने साथ जो ले जा रहा है, वो एक क्रांतिकारी कदम सिद्ध होने वाला था भारत के लिए. यह व्यक्ति एक महत्वपूर्ण रोकेट का अतिमहत्वपूर्ण भाग यानि "नोजल कोन" प्रक्षेपण स्थल तक ले जा रहा है. वो भी साइकल पर!!!!
यह चित्र 1963 का है. केरल का एक छोटा सा कस्बा थुम्बा. 21 नवम्बर को भारत ने वहाँ से अपना पहला रोकेट आकाश में छोड़ा था. जैसा कि आप देख ही रहे हैं, उदासीन सरकार की बदौलत कोई ढंग की यातायात सेवा भी उपलब्ध नहीं कराई गई थी और न ही अच्छा खाशा बजट मिला था देश के वैज्ञानिकों को. फिर भी उनकी मेहनत रंग लाई. उस दिन देश का पहला रोकेट अंतरीक्ष में गया था. जो दो व्यक्ति इस अभूतपूर्व घटना को मूर्तरूप देने के लिए जिम्मेदार कहे जा सकते हैं, वे डा. होमी भाभा एवं विक्रम साराभाई हैं.
डा. भाभा ने उस दिन कहा था कि पश्चिमी जगत जिस धरती पर खडा है, हम भी वहीं खडे है. फर्क सिर्फ इतना है कि वे हमसे 4-5 साल आगे हैं. लेकिन हम अगर युहीं मेहनत करते रहे तो 10 साल में उनकी बराबरी कर लेंगे.
अफसोस है कि हम बराबरी नहीं कर पाए. कई वजहें हो सकती है इसकी - हमारे संसाधन सिमित हैं, हमारा देश इतना खर्च अंतरीक्ष विज्ञान पर नहीं कर सकता. पर सबसे महत्वपूर्ण वजह तो यही रही है कि इस देश के निति निर्धारकों के पास ना तो वो सोच थी, ना ही उन्होनें इस और ध्यान दिया.
लेकिन फिर भी हमने प्रगति तो की. आज हम व्यवसायिक रूप से स्थापित हो चुके है. इसरो की बकायदा मार्केटींग कम्पनी (अंतरीक्ष कोर्पोरेशन) है. हम दुसरे देशों के उपग्रह भी छोडने लगे हैं. नीचे दी गई तस्वीर अत्याधुनीक GSLV की है. पहली तस्वीर और इस तस्वीर को देखने से ही पता चल जाता है कि हमने कितनी प्रगति कर ली है.
मुझे बहुत खुशी हुई जब राष्ट्रपति बुश ने अपने भारत यात्रा के दौरान कहा कि अब अमरीकी उपग्रह भी भारत से छोडे जा सकेंगे.
पर अभी भी काफी मंजिले और बाकी है. हमें काफी आगे जाना है.
मुझे उस दिन का इंतजार है जब भारत अपना दूरसंवेदी उपग्रह "चन्द्रयान - 1" छोडेगा. शायद अगले साल वो खुशनसीब दिन आ ही जाए.

1 Comments:
विडम्बना यह है कि भाभा को मरवाने के पीछे अमरीकी खुफ़िया एजेंसियों का ही हाथ माना जाता है।
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