27.7.06

क्या ऐसा हो सकता है?

कल मैने गुजराती दैनिक "सन्देश" में एक आलेख पढा. अभी कुछ दिनों पहले श्रीनगर में सैलानीयों पर ग्रेनेड हमले हुए थे तब एक गुजराती पर्यटक उसी समय एक शिकारे पर भी था. हमले के तुरंत बाद उसने शिकारे के मालिक तारिक अनवर से बातचीत की. तारीक ने जो कुछ कहा उसका सारांश:

तारीक:
  • ये आंतकवादी नही है. जिन्हे आप आंतकवादी कहते हैं वे हमारे लिए मुजाहीद हैं यानि कि स्वतंत्रता सैनिक.
  • ये हमले इसलिए होते हैं क्योंकि भारतीय फौज यहाँ है. हमें भारतीय फौज से नफरत है. कोई कश्मीरी इन लोगों से बात नहीं करता.
  • हमें आज़ादी चाहिए. भारत ने हमें गुलाम बना रखा है.
  • हमने हिन्दुओं को नहीं भगाया. वे लोग मुज़ाहीदों से डरकर खुद ही भाग गए. (जब पुछा गया कश्मीरी पंडितों को क्यों निकाल दिया गया?)
  • मुशर्रफ चालाक है. मैं तो उसे डरपोक समझता था पर वो तो शेर निकला.
  • वाजपेयी को हम शेरे हिन्द समझते थे. पर वो तो मुशर्रफ की एक धमकी से ही बिल्ली बन गया.
  • मुम्बई धमाकों के बाद टीवी मे मनमोहन सिंह को देखा. कैसे काम्प रहे थे. (हंसते हुए) उनसे ज्यादा बहादूर तो हमारे कश्मीरी हिजडे हैं.
  • हमें आजाद मुल्क चाहिए. आजाद कश्मीर.

ये पुरा आधा पन्ने का साक्षात्कार है. यह कितना सच है यह तो अखबार के सम्पादक ही जानें. पर मन में सवाल जरूर उठते हैं कि क्या वास्तव में हमें कश्मीर के बारे में छलावे में रखा जाता है. क्या हम अपने नेताओं से तथा मिडिया से आधी अधुरी जानकारी ही पाते हैं.

भारत के करदाताओं के अरबों रूपये हर साल कश्मीर को दिए जाते हैं.

आख़िर कश्मीरी चाहते क्या हैं?

8 Comments:

Anonymous Anonymous said...

जवाब यहाँ और यहाँ देखो।

8:24 PM, July 27, 2006  
Blogger Sagar Chand Nahar said...

पंकज भाई
बुरा न मानें, संदेश गुजरात का एक ऐसा अखबार है जिसका काम ही विवाद फ़ैलाना, मैं इस समाचार के लिये नहीं कहता की यह उन्होने झूठ लिखा होगा, अगर यह सब सच है तो बहुत बुरी बात है। पर उनके मन में जो बात है या उनके विचार जो है उन्हे कोई कैसे बदल सकता है।

8:52 PM, July 27, 2006  
Blogger ई-छाया said...

दुःख है कि यह सब काफी हद तक सच है, बेवकूफ काश्मीरियों को मालूम नही कि आजादी की कीमत क्या होगी। छोटे देशों की कोई औकात है इस दुनिया में? पूछो जाकर उन नेपालियों से जो लेबनान में फँस कर अपना दूतावास ढूँढ रहे थे और भारतीय दूतावास से दया की भीख मांग रहे थे। यह काम भारत ही कर सकता है कि उसने उन नेपालियों को भी ससम्मान बाहर निकाला।

12:32 AM, July 28, 2006  
Blogger Kaul said...

जो "सन्देश" में लिखा गया है, वह सौ प्रतिशत सही है। कश्मीर का लगभग हर मुसलमान भारत से घृणा करता है। कई मामलों में वे पाकिस्तानियों से भी पाकिस्तानी हैं। कश्मीर भारत के एक कैंसर-युक्त अंग की तरह है, जिसे न काट फेंकना सुरक्षित है, न उस पर इलाज में अरबों खर्चना। कश्मीरियों को लगता होगा कि आज़ाद हो कर वे पता नहीं क्या कर लेंगे, पर हैरानी यह है कि पाकिस्तान और अफ़्ग़ानिस्तान की हालत ने उन्हें कुछ नहीं सिखाया। जिस मुशर्रफ पर ये इतना इतरा रहे हैं, वह अमरीका का गुलाम है। इस मसले पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है, पर..

8:04 AM, July 28, 2006  
Anonymous Anonymous said...

कौल साब सही कै रिये हैं। चक्कर यह है कि अधिकतर कश्मीरी आवाम बरगलाया हुआ है, वे नहीं जानते कि सही क्या है और गलत क्या है। जिस पाकिस्तान के नाम का वो जाप करते हैं, उसी के उकसावे पर अफ़रीदियों और अन्य कबाईलियों ने उन पर हमला कर कत्ल-ए-आम किया था, यदि भारत फ़ौज ना भेजता तो उन कबाईलियों ने कश्मीर पर कब्ज़ा कर लिया होता।

दूसरे, कश्मीर को बतौर स्टेट जितनी सुविधाएँ दी गई हैं उतनी किसी और राज्य को नहीं दी गई हैं। मैं तो समझता हूँ कि अब 50 वर्ष बाद वे सुविधाएँ रद्द कर दी जानी चाहिए, ऐसा पक्षपात और नहीं चलना चाहिए।

1:37 PM, July 28, 2006  
Blogger Nitin Bagla said...

पता नही मैं सही हूं या गलत...पर शायद ग्रेनेड हमले मुम्बई धमाकों के पहले हुए थे...???

4:02 PM, July 28, 2006  
Blogger पंकज बेंगाणी said...

सागर भाईसा यह सही है कि सन्देश बहुत विश्वसनीय दैनिक तो नही है, पर फिर भी यह एक ज्वलंत मुद्दा तो है ही.

ई-शेडो, रमणजी एवं अमित से मैं सहमत हुँ. कश्मीरीयों को बेवजह दी जाने वाली खैरात रोक देनी चाहिए.

नितिनभाई की उलझन स्वाभाविक है. जीहाँ, पहले ग्रेनेड हमले हुए थे, उसके तुरंत बाद मुम्बई बम धमाके हुए थे. और यह इंटरव्यु उसके बाद हुआ था.

4:57 PM, July 28, 2006  
Blogger नीरज दीवान said...

तारिक़ अनवर से मेरी मुलाक़ात हो जाती तो अच्छा होता. मैं ऐसे सिरफिरों का दिमाग़ चबाना चाहता हूं.

6:33 PM, August 11, 2006  

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