11.8.06

भोली गाय, धुर्त सियार और कपटी बन्दर

जंगल महासभा की बैठक चल रही थी। सबसे हरे भरे जंगल का राजा बन्दर, उभर रहे नए जंगल
की “सरदार” गाय और उसके पडोसी बीहड का तानाशाह सियार बैठे बतिया रहे थे।


बन्दर: नॉव वी आर मोर सेफ एंड सिक्योर!!
सियार: यस बॉस। यु आर 100% सेफ, डोंट वॉरी।
गाय: हुजूर जरा हमारी भी तो सुनो।
बन्दर: (लॉलीपोप चुसते हुए) हाँ बोलो क्या प्रोब्लम है?
गाय: वही जो आपकी प्रोब्लम है।
बन्दर: हमारी क्या प्रोब्लम है? सब कहते हैं मै ही प्रोब्लम हुँ!! खी खी खी...
सियार: (लार टपकाते हुए) ए बॉस..
बन्दर: क्या है?
सियार: एक लोलीपॉप मुझे भी दो ना...
बन्दर: धत तेरे की... इतनी चॉकलेट फ्री में देता तो हुँ, जी नहीं भरता तेरा।
सियार: उससे तो खाली जेबें ही भरती है ना बॉस, कुछ खाने को नही मिलता।
बन्दर: अरे भूखे! और कितना खिलाऊँ? सब मुफ्त में खाने की आदत पड गई है तुझे। खी खी खी...
गाय: अरे इसे मुफ्ते में खिलाते रहोगे या कुछ हमारी भी सुनोगे?
बन्दर: हाँ तो बोलो ना। हमने कब मना किया है। तुम भी हमारी दोस्त हो।
गाय: बात वही पुरानी है, इस सियार के जंगल के सांड हमारे यहाँ उत्पात मचाते हैं।
बन्दर: बहुत बुरी बात है, हम तुम्हारे साथ हैं।
सियार: क्या हुजूर आप भी। पहले सबूत तो पुछो!
बन्दर: हाँ हाँ, सबूत तो दो।
गाय: अरे कितने सबूत दें। दे देकर तो थक गए। ये देखो सांड के पावँ के निशान की फोटो।
बन्दर: हाँ निशान दिखाई तो दे रहे हैं। खी खी खी। जाने दो चॉकलेट खाओ।
सियार: (आँख मारते हुए) क्या हुजूर, कहाँ दिखाई दे रहे हैं निशान।
बन्दर: अरे हाँ भई, क्लीयर नहीं है, धुन्धला धुन्धला ही दिखे है। तुम एक काम करो रंगीन फोटो लाओ तो समझ आए, क्यों सियार।
सियार: दुरूस्त है, एकदम।
गाय: अरे साहब, रंगीन फोटो ही तो है।
बन्दर: आँए! रंगीन है, वाकई!!
सियार: (आँख मारते हुए) लेकिन हुजूर ईस्टमेन कलर तो नही है ना।
बन्दर: यह भी खूब रही। खी खी खी। जाओ भई ईस्टमेन कलर फोटो लाओ तो समझ आए।
सियार: और अन्नदाता, क्या भरोसा ये सांड के ही निशान हैं? मुझे तो इन गायों के निशान ही लगते हैं।
गाय: अरे गायों के पावं छोटे होते हैं, सांडो के बडे। ये सांडो के निशान हैं। आए दिन उत्पात मचाते हैं।
सियार: कहाँ मचाते हैं, बेचारे वो तो विद्यार्थी हैं।
गाय: और बन्दर साहब, आप ना भूलें आप भी इन सांडों से परेशान हैं। याद है कैसे इन सांडों ने आपके जंगल के दो बडे बडे पेड गिरा दिए थे।
बन्दर को जैसे जोर का झटका लगा, उछलकर बोला: ओये, यह तो भूल ही गया था। क्यों रे सियार, कंट्रोल काहे नहीं करता इन सांडो को?
सियार: हुजूर वो मैरे बस में कहाँ है, अरे हम तो खुद उनसे परेशान हैं।
बन्दर: सच्ची?
सियार: मुच्ची!!
बन्दर: तब ठीक है। देखो गाय यह सियार भी तो परेशान है। हम सब एक हैं।
गाय: अरे मालिक, इसके जंगल की फसल खाकर ही तो तगडे सांड बने हैं। इसको बोलो उनको घास डालना बन्द करे।
बन्दर: कर देगा, अभी बच्चा है। नादान है।
गाय: क्या खाक बच्चा है, पचास साल से ज्यादा का तो हो गया।
सियार: देखो ना बन्दर अंकल, ये चिढाती है।
बन्दर: (गुलाटी मारकर) जबान को लगाम दे गाय वरना खैर नहीं।
गाय: (गुस्से से) अच्छा यह बात है, देख बन्दर अब हम तुम्हारे मोहताज नहीं।
सियार: देखा। देखा मालिक। कैसे नाम से बुलाने लगी। इसकी यह जुर्रत। मै तो पहले ही कहता था इसको सर पर मत बिठाओ, सर पर चढकर नाचेगी एक दिन। देखा नहीं पडोसी जंगल का ड्रेगन कैसे नाचने लगा अब आपके सर पर।
बन्दर: हाँ यार, ऐ गाय औकात में रह। वो देख वो इंग्लीस्तानी छुटकु बन्दर कैसे मैरी आज्ञा में चलता है। टोनी बेटा गुलाटी मार के दिखा तो। हाँ... देखा कितना प्यारा बच्चा है। ऐसे रहने का।
सियार: ही ही ही... कैसा नोटंकीबाज है, छुटकु बन्दर। और उसी छुटकु ने गाय के जंगल पर कित्ते साल राज किया था ना मालिक।
गाय: मत भूलो तब तुम्हारा हमारा एक ही जंगल था।
सियार: हाय हमारी बदनसीबी। लेकिन आज तो हम बन्दर के साथ हैं। बन्दर – सियार भाई भाई।
बन्दर: (उछलते हुए) हाँ हाँ , बन्दर – सियार भाई भाई, आओ मिलकर करें लडाई।
गाय: इतना उछलो मत गिर जाओगे।
बन्दर: खी खी खी... गिरे हुए क्या गिरेंगे? देखो मै तो रोज गिरता हुँ। कुछ नहीं होता। लो देखो फिर गिर गया। खी खी खी।
सियार: मालिक मैं भी गिरूंगा, मै भी गिरूंगा।
बन्दर: तो गिर ना! रोज गिरा कर।
सियार जोर से उछला और धम्म से गिरा। गिरते ही नाचने लगा: गिर गया, गिर गया!!
बन्दर: बेटा लगी तो नहीं।
सियार: ना मालिक। गिरता मैं हुँ, चोट तो गाय को लगती है। ही ही ही ही।

(गाय चुपचाप देखती ही रही। बहस जारी है)

6 Comments:

Blogger Ashish Gupta said...

Bahut sahi. Kash gay samajh jaaye ki bandar bharose kuchh nahi hone wala...

9:31 PM, August 11, 2006  
Blogger Atul Arora said...

दरअसल गाय को भी पता है , बँदर को भी और सियार को भी। नही पता है तो इन तीनो के देशवासियों को। बेचारे समझते हैं कि गाय सबूत दे रही है, भईये बँदर ऊँची टहनी से वह देख लेता है जो गाय भी न देख सके। यह सब तमाशा चल रहा है पब्लिक को उल्लू बनाये रखने का। तीनो शामिल हैं इस खेल में , समझे कि नही?

10:04 PM, August 11, 2006  
Anonymous Anonymous said...

पंकज भाई, बहुत सही लिखा आपने। अतुल जी ने तो और भी खुलासा कर दिया। वे तो अपनी दूरदर्शिता और बन्दर के हरित जंगल के उंचे-उंचे वृक्षों से अपने आस-पास एवं गाय की शस्य-श्यामला भूमि और सियार की रियासत तीनों का विहंगम दृष्य अधिक स्पष्टता से देख सकते हैं।

गोपालकों की भूमि में कोई वास्तविक सिंह अथवा भरत समान सिंह के दाँत गिनने वाला कभी राज्य करेगा और बन्दर के असमर्थन / घुढ़की का भय छोड़ेगा?

12:56 AM, August 12, 2006  
Blogger Udan Tashtari said...

बहुत सही.बेहतरीन अदाकारी के साथ लिखा है मास्साब, मजा आ गया.
समीर लाल

4:56 AM, August 12, 2006  
Blogger Sagar Chand Nahar said...

पात्र सियार वास्तव में सियार नहीं उसकी खाल में गीदड़ है। और बेचारी गाय, गाय काहे की बकरी है, लोग जबरदस्ती उसको दुह ले जाते है, पर वह कुछ नहीं कर पाती ।

7:15 PM, August 12, 2006  
Blogger पंकज बेंगाणी said...

आशीषजी, अतुलजी, राजीवभाई, समीरजी और भाईसा धन्यवाद।

अगली कडी लिख रहा हुँ. :-)

7:59 PM, August 12, 2006  

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