छ: बजे का सिक्सर >> मनमोहन बकरी है
सही में यार... मनमोहन सिंह हैं ना अपने प्रधानमन्त्री महोदय, वो एकदम बकरी जैसे हैं। पता नहीं क्यों पर कभी भोले भाले से नजर आते हैं और कभी तो मिमियाते हुए दिखते हैं। तो क्या कहा जाए उनको।
छोटा मुँह बडी बात तो कह दी है पर आखिर हक है मुझे, मै भी देश का 1.5 अरबवां हिस्सा हुँ और मेरे देश के नेता को बडा ही कमजोर सा पाता हुँ। छोटी बुद्धि है मेरी, पर हमारे जैसे इंसान को तो बाहरी आउटलुक ही नजर आता है ना। समझदार लोग कहेंगे वे विद्वान हैं, तो हम कहते हैं जरूर होंगे भाई। विलायती डिग्री भी है उनके पास तो। लेकिन गुरू आज के जमाने में ब्रांडिग का बडा महत्व है। और माफ किजीएगा प्रधानमत्री ब्रांडिग के मामले में तो पुरे फ्लोप हैं।
बडी चिढ चढती है मुझे। अब आंतकवाद ही ले लिजीए। ये गुवाहाटी में लुप्तप्रायः उल्फा सरकारी मेहरबानी से फिर जिंदा हो गया। दो चार पटाखे फोड डाले और हमारे नेता का धुएँ में दम घुटता है तो जाने कहाँ मुँह छिपा कर बैठ जाते हैं।
एक शीवराज पाटील है। गृहमंत्री कम फ्री मंत्री ज्यादा लगते हैं। उन्हे तो "उडनतस्तरी" में बैठकर ताली बजाने वालो की जमात में शामिल हो जाना चाहिए। उनका लीडर बनने की सारी औकात है उनमें।
और सुनिए एक अपने जसवंत साहब भी हैं। दो दिन पहले न्यूज चैनल पर व्यूज दे रहे थे कि सरकार को आंतकवादीयों से निबटना नहीं आता। हाँ भाई, इनसे सिख लो। सिखलो कि कैसे तालीबानीयों के पास थाली में रेवडियाँ बिछाकर ले जायी जाती है।
अपना देश स्साला सही में राम भरोसे चलता है। आज रवि ने मस्त बात बोली कि सिर्फ राम भरोसे नहीं 15% खुदा भरोसे, 5% इशु भरोसे और 0.5% महावीर भरोसे भी चलता है।
पर जिसके भरोसे चलना चाहिए उन्हे तो खुद पर भी भरोसा शायद ही होगा।
खुद से पुछकर देखिए आज हमारी औकात क्या है? बांग्लादेशी भिखारी तो हमारी लगाकर चले जाते हैं। एक माओवादी डिंगे हांककर चला जाता है। ड्रेगन धमकी देता है कि खा जाउंगा। कश्मीर सम्भलता नहीं। उल्फा पटाखे फोडता है। और लो अब अबु सलेम चुनाव भी लडेगा, बहुत सम्भव है हमारे भाईयों के सक्रीय सहयोग से जीत भी जाएगा। फिर वो कानुन बनाएगा। अफज़ल मजे मार रहा है।
हम भी क्या करते हैं? मेरे जैसे लोग शाम को थक हारकर अपने दुःख की भडास इसतरह से निकाल देते हैं बस। लेकिन जो ताकत है उसका इस्तेमाल हम कहाँ करते हैं। करते तो वोटींग परसेंटेज क्यों 40-50% रहता? वोट ही नहीं देते तो फिर सरकार को गाली भी क्या दें। फिर तो जितते रहेंगे चोर। और कोई बिना कभी पंचायत का चुनाव भी जीते प्रधानमंत्री बनता रहेगा।
कब तक? आखिर कब तक? कब बकरी दहाडना सिखेगी? या खाली नाम का सरदार ही बनी रहेगी।
भारत बकरी नही है, उसे शेर बनना है। दहाडना सिखना है, मिमयाने से चुहे भी नहीं भागते, कुत्ते क्या खाक भागेंगे।

7 Comments:
क्यूट ब्वाय को बहुत गुस्सा आ रहा है, मगर यह गुस्सा सच्चा है।
सच में कोई नेतृत्व नहीं दिखता देश में। :(
"उन्हे तो "उडनतस्तरी" में बैठकर ताली बजाने वालो की जमात में शामिल हो जाना चाहिए। "
--ये क्यूँ भाई!
उड़न तश्तरी में बैठकर भी उत्कृष्ट कार्यों के लिये ही ताली बजती है, फ्री मंत्रियों के लिये नहीं!! :)
--यह ६ बजे का सिक्सर है, खतरनाक!! बड़े ही गुस्से के साथ लगाया जाता है। अमां, करने दो काम उन्हें. अगले चुनाव में मैडेम को बनवा देंगे, ब्राडिंग के लिये,
भैया ये जन्मदिवस पर इतना गुस्सा होने की क्या जरूरत है। साल में और भी दिन हैं इसके लिए। अभी तो केक खाओ और मौज़ करो।
साथ में जन्मदिन की शुभकामनायें
रवि भाई का आंकलन सही नहीं है, अगर वाकई 15% खुदा के भरोसे चल रहा होता तो आज पंकज भाई को यह लिखने की नौबत नहीं आती।
यह देश सिर्फ़ और सिर्फ़ मैडम भरोसे चल रहा है,जिनसे बिना पूछे तो शायद सरदार पानी पीने भी नहीं जाते होंगे।
काहे को अपना B.P. बढा रहे हो और वह भी जन्मदिन मे , वैसे एक बात मुझे पल्ले नही पडती कि यह हमारे अकर्मण्य नेता इतनी उम्र होने पर भी मरते क्यों नही, एक आम हिन्दुस्तानी की औसत उम्र तो 55-65 के बीच की है। शायद जनता का खून पी-2 कर औरों की उम्र लग जाती होगी।
'मनमोहन बकरी है' और तुम उस बकरी की मींगणी .
Anonymous भाई,
नाम तो लिखना था, अच्छा लगता
आपको सर्वश्रेष्ठ टिप्पणीकार का पुरस्कार भी
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