13.12.06

क्या कृष्ण मवाली थे?

मेरे इस वाक्य का सन्दर्भ यहाँ है। इन महापुरूष के प्रति मुझे बहुत श्रद्धा है।

डिस्क्लेमर : मैं किसी का नाम नही ले रहा हुँ।

कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनका एकमात्र उद्देश्य धरना प्रदर्शन करना और विरोध दर्ज करवाना होता है और उसे वे शायद सबसे सृजनात्मक कार्य मानते हैं।

ये लोग एक विशेष प्रकार का काला गोगल्स पहनते हैं, जिसमें संजय दृष्टि की सुविधा होती है, वे दूर का देख सकते है और मन माफिक सोच भी सकते हैं।

ये लोग पक्षपाती होते हैं पर दूसरे लोगों के प्रति जहर भी उगलते हैं कि "वो" पक्षपाती है। क्या ही अच्छा हो वे पहले खुद अपनी गिरहबान में झांके!

इन लोगों को नरेन्द्र मोदी से क्या तकलीफ है, मैं आजतक नहीं समझ पाया! क्यों ये लोग एक व्यक्ति विशेष के पीछे हाथ धोकर पडे रहते हैं। “मोदी के राज में” यह हो गया ना वो गया। अरे भाई क्या हो गया?

एक साल बाद ही चुनाव होने वाले हैं गुजरात में। लोग नहीं चाहेंगे तो मोदी की क्या बिसात है? उखाड फेंकेगी जनता। आप क्यों यु.पी. में बैठकर टेंशन लिए जा रहे हो?

मोदी कोई तोप नहीं है। वे उतने ही जवाबदेह मुख्यमंत्री है जितने बाकी के अन्य हैं। उनपर मुकदमा चलाया जा सकता है और अदालत उन्हे सजा भी दे सकती है। उससे भी आगे गुजरात की जनता भी उन्हे चुनाव में सजा दे सकती है।

लेकिन समाजवादी चोला पहने कुछ लोगों को लगता है कि सारे भारत का टेंशन उनको ही है। ये लोग मौका तलाशते रहते हैं कि कब कुछ हो और कब व्यंग्य बनाऊँ। अब इसके पीछे की मंशा तो वही जाने।

अब इनको महिला कोलेज के आगे खडे सडकछाप रोमियो और मवालीयों में भगवान कृष्ण नज़र आते हैं तो कोई क्या कह सकता है? इन मवालीयों की वजह से छात्राओं को जो परेशानियाँ होती है वो मैने खुद अपने कोलेज के दिनों में देखी है।

मैं कुछ उदाहरण देता हुँ।
  • हमारे एक व्यवसायिक मित्र जहाँ से हम प्रिंटिग कराते हैं का भतीजा हर दुसरे महिने नये मोबाइल के साथ दिखता है, उसको हमेंशा मैने अपने दोस्तों के साथ इसतरह की बातें करते पाया:
    ”वो युसुफ को कल उसके भाई ने मारा, गुजरात कोलेज के आगे खडा रहता था।“
    ”आज किधर जाना है? वहाँ तो कल थे ना”
    ”मज़ा नहीं आता यार उधर, सुरेश के कोलेज के उधर माल है”
    आदि... आदि...
    (ये महाशय एक “विशेष” समुदाय से हैं, उनके मित्र दुसरे “तथाकथित कट्टर” समुदाय से हैं)

  • मैं गुजरात कोलेज में पढता था। वहाँ 30 - 35 साल के भी छात्र होते थे, जिनके दो तीन बच्चे भी थे। उनका एकमात्र कार्य लोगों को एडमिशन दिलवाना, दलाली खाना और लाइन मारना होता था।

  • आप किसी भी कोलेज में चक्कर मार आइए, ज्यादातर कोलेजों में आप इन मवालीयों को खडा पाएंगे।



इनको रास्ते पर लाने का पहला कार्य पुलिस और कोलेज के अधिकारीयों का है। अगर वि.एच.पी. के कार्यकर्ता अपने दम पर यह कार्य कर हैं तथा बाहुबल का प्रयोग कर रहे हैं तो वो गलत है।

लेकिन यहाँ अहमदाबाद में दुर्गा वाहिनी की महिलाएँ भी इन्हे खदेडने में जुटी हुई हैं, और मेरी नजर में वो सही है।

अंत में मेरी एक प्राथना।

आपकी विचारधारा अलग है, हमारी अलग। हम आपकी कद्र करते हैं। आपकी विचारधारा, आपका समाजवाद महान होगा। जरूर होगा। पर कृपया आप पक्षपाती बनकर मनगढंत बातें ना करें।

8 Comments:

Blogger गिरिराज जोशी said...

इन महापुरूष के प्रति मुझे बहुत श्रद्धा है।
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डिस्क्लेमर : मैं किसी का नाम नही ले रहा हुँ।

:)


वैसे हमेशा कि तरह आपने गुस्सा भी शालीनता से जाहिर किया है. मैं प्रार्थना करूँगा की यह आलेख व्यक्तिगत रिस्तों में कड़्वाहट पैदा ना करें.

बाकि अपनी सोच को सार्वजनिक करना, दूसरों पर कटाक्ष करने से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है.

2:19 PM, December 13, 2006  
Anonymous Anonymous said...

अगर दुर्गा वाहिनी और वी एच पी यह काम नहीं करती और पुलिस भी नहीं करती( वो तो वैसे भी नहीं करती) तो यही लोग चिल्लाते कि गुजरात में नरेन्द्र मोदी के राज में बहन बेटी की आबरू सलामत नहीं है। :)
यानि कुछ लोगों का जन्म ही होता है किसी ना किसी बात पर विरोध करने के लिये, चाहे हो अच्छी बात हो या बुरी।
पता नहीं नरेन्द्र मोदी के राज करने से कितने लोगों का कितने सेर लहू रोज जलता है, बेचारों की ऊर्जा को व्यर्थ होने से बचाने के लिये नरेन्द्र मोदी को इस्तीफा दे देना चाहिये।
पर प्रश्न इस बात का है कि क्या नरेन्द्र मोदी के हट जाने से इनके मन को शान्ति मिल जायेगी या फ़िर विरोध का कोई नया कारण ढूंढ लेंगे?

3:40 PM, December 13, 2006  
Blogger Pratik Pandey said...

बात तो आपकी कुछ-कुछ ठीक है, मोदी से इस घटना का कुछ लेना-देना नहीं है। ख़्वामख़्वाह हर बात में मोदी को घसीटना बौद्धिक दीवालियापन ही दर्शाता है। इस तरह की घटनाएँ भारत में हर जगह होती हैं और गुजरात से ज़्यादा उत्तर प्रदेश में होती हैं, इसमें कोई दो राय नहीं है। लेकिन ऐसा कहीं भी घटित हो, निन्दनीय ही रहेगा। दुर्गा वाहिनी और बजरंग दल वगैरह पर यह सब कुकृत्य करने का लाइसेंस नहीं है कि वे जब चाहें, लोगों को मारें-पीटें।

8:22 PM, December 13, 2006  
Blogger Kaul said...

यह टिप्पणी इस से संबन्धित पोस्ट (समाजवादी जनपरिषद) पर की गई है।
--
हमें इन सब चीज़ों को ब्लैक या व्हाइट के चश्मे से नहीं देखना चाहिए। राधा, कृष्ण, भीम, हिडिंबा, यह तो सब कहानियाँ हैं — इन को सच मानकर न तो इन की समसामयिक विषयों से तुलना की जा सकती है, न इन्हें आदर्श आचरण की परिधि में रखा जा सकता हैं। यदि आप के बच्चे युवा हों - विशेषकर पुत्रियाँ - तो आप भी शायद उन को रासलीलाओं से दूर ही रखना चाहेंगे। विहिप वालों का पुलिसिया व्यवहार पचता तो नहीं है, पर यदि यही काम सिटिज़न वेलफेयर कमेटी के नाम से कोई NGO करती तो शायद आप को आपत्ति नहीं होती। पुलिस से तो उम्मीद है नहीं, वह या तो किसी को पकडेगी नहीं, पकडेगी तो केवल पैसा लेने के लिए। इसलिए किसी हद तक सिटिज़न ऐकशन ठीक भी है, पर यहाँ जिस नाम के अन्तर्गत किया गया वह कुछ लोगों को अपाच्य है। यदि मज़दूर इकट्ठा हो कर किसी कंपनी का काम बन्द कराएँ या उसे लूटें या अवैध हड़ताल करें तो वह ठीक है।

फिर यह भी मुद्दा है कि रासलीला या प्रेमी युगलों का मिलन किस हद तक सार्वजनिक स्थानों में होना चाहिए और कितना पर्दे में? कितना इस में पारस्परिक इच्छा से होता है, और कितना छेड़छाड़ के दायरे में आता है? जहाँ हम पेप्सी-कोक या अन्य अमरीकी चीज़ों का विरोध करते हैं, वहीं कुछ लोग सार्वजनिक जगहों पर चुम्मा-चाटी का विरोध भी करें तो क्या बुरा है?

10:05 PM, December 13, 2006  
Blogger Udan Tashtari said...

अच्छा तरीका अपनाया पुनः अपनी बात रखने का. मै भले ही कानून को अपने हाथ में लेने वाली बात का समर्थन न करुँ मगर शालीनता के साथ अपने तर्क रखने वाली आपकी शैली का समर्थन जरुर भरपूर करता हूँ. :)

2:54 AM, December 14, 2006  
Anonymous Anonymous said...

टिप्‍प्‍ड़ी करने आया था किन्‍तु टिप्‍पड़ी-‍टिप्‍पड़ी ल रह कर लेख हो गया था तो सोचा टिप्‍पएी से रूप से यहां छापना ब्‍यर्थ होगा इस लिये इसे अपने ब्‍लाग पर ही स्‍थान देना उचित समझा http://pramendra.blogspot.com/

4:54 AM, December 14, 2006  
Anonymous Anonymous said...

मोदी चाहे जैसे भी हों उत्तर प्रदेश और बिहार के मुख्यमंत्रियों से तो अच्छे ही होंगे, और उस घटना का मोदी से क्या लेना देना है समझ नही आया।

5:55 AM, December 14, 2006  
Anonymous Anonymous said...

अहमदाबाद वाली घटना का सच तो भगवान जाने लेकिन मोदी को कोसना तो कुछ 'महान' समाजवादियों के लिए एक फैशन हो गया है। मेरा मानना है कि 'कट्टरवादी' मोदी 'समाजवादी' मुलायम सिंह यादव से लाख गुना बेहतर इंसान, मुख्यमंत्री और प्रशासक हैं।

12:58 AM, December 15, 2006  

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