असहनशील भारत
अतुल्य भारत तो नदारद है पर असहनशील भारत के दर्शन आजकल आसानी से हो रहे हैं!
बंगालुरू में मुसलमानों ने सद्दाम की फांसी का विरोध करने का बडा ही मौलिक और आश्चर्यजनक तरीका ईजाद किया और वाहनों मे आग लगाने के साथ साथ कई दुकानें भी स्वाहा कर दी। अपने ही वाहनों और अपने ही लोगों की रोजीरोटी के साधनों को जलाया गया एक ऐसे व्यक्ति के नामपर जो भारतीय भी नही है। इस हुडदंग में एक मासुम भी मारा गया जिसे शायद पता भी नही होगा कि सद्दाम आखिर था कौन? वैसे इन दंगाइयों में से बहुतों को पता नही रहा होगा कि आखिर विरोध किस बात का हो रहा है? निट्ठले लोगों को अपने मनमाफिक काम का बहाना चाहिए, और यह काम सृजनात्मक तो हो नहीं सकता तो विध्वंसक ही सही।
ठीक वैसे ही जैसे कानपुर में राम के तथा बजरंग बली के स्वघोषित चेलों ने किया। इन महानुभावों के तो फुटेज भी टीवी पर देखने को मिले। इनका तरीका भी बडा मौलिक किस्म का है और किसी भी कोण से सृजनात्मक नहीं है। हो भी नही सकता, अगर इन कार्यकर्ताओं को ध्यान से देखा जाए तो आसानी से समझा जा सकता है कि इनमें से कोई भी पांचवी पास भी नहीं होगा। भाडे के सडकछाप मवाली माइक पर बोलना तो जिन्दगी में सीख नही सकते पर माइक तोडना इन्हे अच्छी तरह से आता है।
इधर इन्दौर में भी दो समुदाय के लोग हथियारों का ओपर ऐयर प्रदर्शन करते हुए भीड गए और आगजनी शुरू कर दी।
वस्तुत: ऐसे असामाजिक लोगों से देश की छवि और समाज तो प्रभावित होते ही है, पर हमारे दैनिक कार्यों एवं रोजीरोटी पर भी गहरा असर होता है। स्कूल कोलेज बन्द तो पढाई बन्द, दुकानें बन्द तो मजदुरों के लिए खाने का ईंतजाम भी खत्म, और मध्यम वर्गीय लोगों के लिए मानसिक शांति खत्म।
सब खत्म लेकिन असहनशीलता खत्म नहीं होती।

11 Comments:
सस्ती लोकप्रियता तो अब इस देश का सबसे बड़ा हथकंडा है,प्रसिद्ध होने के लिये कुछ भी…शोर के चौराहे पर खड़े है हम और दुसरो की तकदीर का फैसला सुनाते हैं बेंगानी भाई,ये जलते प्रश्न शायद हमें इन सोंचो से बचाये…काफी सटीक धार में है बात्।
परसाई जी कहते थे- जब लोगों के सामने कोई आदर्श नहीं होंगे, काम नहीं होगा तो लोग यही सब करेंगे! ये आवारा भीड़ के खतरे हैं!
आवारा भीड़ के खतरे का लिंक ये है
http://hindini.com/fursatiya/?p=132
कईयों ने तो इसे ही रोजी रोटी का साधन बना रखा है, जब बहुत दिनों तक दंगे फसाद नहीं होते तो इनके भूखे मरने की नौबत आने लगती है. शर्मनाक बात है.
किस दुनिया में रहते हो तुम भैया पंकज भूल गये क्या
वसुधा पूर्ण कुटुम्बी अपनी, हम सब इसके अनुयायी हैं
तब ही तो बंगलौर प्रदर्शन करता ईराकी घटना पर
बात अगर होती लंदन में होती अपनी रुसवाई है
सर्दी होती नैरोबी में तो जुकाम होता दिल्ली को
और हमारे पथ निर्देशक, हर अवसर पर सबसे आगे
आग लगा कर हाथ तापना, अपना उल्लू सीधा करना
सहनशीलता,भ्रातॄवाद सब इनके द्वारे भिक्षा मांगे
Great Article! Thank You!
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