भारतीय विपक्ष और अमरीकी विपक्ष
सोनियाजी पिछले दिनो गुजरात आईं. आदिवासी इलाके में लोगों का उद्धार करने गई और दो दर्जन नेताओं के साथ एक भाषण भी दे दिया। खैर वो तो कोई खाश बात नही है, पर मेरा ध्यान उनके इस बयान पर गया:
गुजरात में कानुन व्यवस्था की हालत अच्छी नहीं है। कोंग्रेस शासित राज्यों में कहीं अच्छी कानुन व्यवस्था है, लोग सुरक्षित हैं।
मैं तो पढकर भोंच्चका रह गया। नहीं इसलिए नहीं कि उन्होने गुजरात में कानुन व्यवस्था को खराब बताया। वो तो ठीक ही है, विपक्ष में हैं तो विपक्ष की भाषा ही तो बोलेंगी। पर आश्चर्य हुआ जब उन्होने कहा कोंग्रेस शासित राज्यों में गुजरात से अच्छी कानुन व्यवस्था है।
उन्हें शायद पता ना हो पर कश्मीर में कोंग्रेस का ही राज है, असम में भी जहाँ हर दिन गिनकर दो धमाके हो रहे हैं और सैंकडो लोगों को मार डाला गया है, महाराष्ट्र में भी जहाँ मुम्बई और मालेगाँव में धमाके हुए, और दिल्ली में भी जहाँ सरकार से भिडी जनता पर गाज गिरती रही।
वस्तुत: हमारे देश में लोकतंत्र परिपक्व हुआ ही नहीं है, ऐसा लगता है। विपक्ष में चाहे कोंग्रेस हो या भाजपा, वजह बेवजह एक दुसरे को नाहक ही कोसना उन्हे विपक्ष का धर्म लगता है।
आज बुश का सम्बोधन सुन रहा था टीवी पर। मुझे आश्चर्य हुआ जब भाषण के दौरान अनेकों बार डेमोक्रेटिक सांसद भी खडे होकर तालीयाँ बजाते दिखे। हमारी संसद में तो ऐसे दृश्य की कल्पना भी नहीं कि जा सकती। अगर मनमोहनसिंह बोलेंगे तो सिर्फ कोंग्रेसी ही मेज पीटेंगे, और अडवाणी बोलेंगे तो भाजपा वाले।
यहाँ तक कि राष्ट्रीय हित के मुद्दों पर भी एकता नहीं दिखाते। चाहे वो पोटा हो या परमाणु सन्धि। क्या पक्ष और विपक्ष में रहने का मतलब सिर्फ एक दुसरे के खिलाफ तलवारे भांजना होता है।
हमारे यहाँ तो नेता बनते ही चेहरा छत की तरफ घुम जाता है, नजरें इतनी उँची चढ जाती है कि नीचे खडा आम आदमी तो दिखता ही नहीं!
हम तो बस कभी मेरा भारत महान कहते हैं कभी अतुल्य भारत!
हम अपने लोकतंत्र और संस्कृति का बखान करते थकते नहीं हैं, पर क्या हम कभी अपनी गिरहबान में झांककर देखते हैं?

8 Comments:
हमारी कीचड़ उछालू राजनीति में इस तरह की उम्मीद नहीं की जा सकती।
सुना नहीं मायावती ने क्या कहा?
मुलायम के नहाने से गंगा ही मैली हो गयी ;)
कभी ऐसा भी होता था एक दो उदाहरण मुझे याद है जब श्रीमती इन्दिरा गांधी ने परमाणू परीक्ष करवाया तब उन्हें सबसे पहले बधाई देने वाले माननीय अटलजी थे।
नेहरू जी स्वयं अटलजी को प्रधानमंत्री बनने का आशीर्वाद दिया था।
अब ना इन्दिराजी जैसे नेता रहे ना ही अटलजी जैसे, अब मायावती- मुलायम, सोनियाजी और लालू का जमाना है अब उम्मीद करना ही बेकार है।
वैसे जब संसद पर आतंकवादी हमला हुआ था तब मैने आटल जी को सुना था कि सोनिया गाँधी ने ही सबसे पहले फोन कर उनकी कुशल क्षेम ली थी और संसद जाने से मना किया था.
बाकि तो राजनित में जो न हो सो कम.
पंकज जी, राजनिति के स्वरूप अमेरिका मे हो या भारत मे कभी अच्छे नही होते। जो टीवी पर दिखता है वो हमेशा सच नही होता। भारत और अमेरिका की संस्कृति अलग-अलग है। भारत में नेता सीधे दुसरो को भला-बुरा कह कर, डरा कर, धमका कर लोगो का वोट लेते है। अमेरीका मे भी यही होता है, मगर so called "sophisticated way" मे। नेताओ को अपना उल्लू सीधा करना होता है, उसके लिए वे तरीके खोज ही लेते है। जब टीवी पर प्रसारण सारी दुनिया देख रही हो तो ताली तो बजानी ही पडती है न। मगर अंदर ही अंदर क्या खीचड़ी पक रही होगी उसकी हमे क्या खबर। हाँ शायद अधिकतर भारतीय नेताओ ने अभी यह पुचकार कर लात मारने का तरीका नही सीखा है।
पंकज जी, राजनिति के स्वरूप अमेरिका मे हो या भारत मे कभी अच्छे नही होते। जो टीवी पर दिखता है वो हमेशा सच नही होता। भारत और अमेरिका की संस्कृति अलग-अलग है। भारत में नेता सीधे दुसरो को भला-बुरा कह कर, डरा कर, धमका कर लोगो का वोट लेते है। अमेरीका मे भी यही होता है, मगर so called "sophisticated way" मे। नेताओ को अपना उल्लू सीधा करना होता है, उसके लिए वे तरीके खोज ही लेते है। जब टीवी पर प्रसारण सारी दुनिया देख रही हो तो ताली तो बजानी ही पडती है न। मगर अंदर ही अंदर क्या खीचड़ी पक रही होगी उसकी हमे क्या खबर। हाँ शायद अधिकतर भारतीय नेताओ ने अभी यह पुचकार कर लात मारने का तरीका नही सीखा है।
बिल्कुल सहि कह आप्ने .हुमरे यह लोक्तन्त्र परिपकव नहि हुआ हे .खर जो जो जाग्रति बडेगि त्यो त्यो आस हो जयेग .
इस विषय में मुझसे किसी ने कहा था कि कम से कम हमारे नेताओं के भाव साफ़ नज़र आते हैं, विपक्ष में हैं वो भी साफ़ नज़र आता है, लेकिन अमेरिका में तो छुपे रूस्तम बैठे हैं, वे लोग ऊपर से दिखाते हैं कि वे प्रसन्न हैं विपक्ष से लेकिन अंदर ही अंदर जुगतें लगाते रहते हैं!! ;)
अब असल बात क्या है ये मुझे नहीं पता। लेकिन इतना जानता हूँ कि अमेरिका दो सौ वर्ष से भी अधिक पुराना लोकतंत्र है और हमे सिर्फ़ 60 वर्ष ही हुए हैं। वैसे खामिया तो हर जगह होती हैं, अमेरिका में यह बात यदि अच्छी भी है तो कई बातें बुरी हैं जो हमारे यहाँ अच्छी हैं!! ;)
@ सागर चन्द नाहर,
सही कहा आपने युद्ध के समय अटल जी ने ही इन्दिरा गांधी को 'दुर्गा माँ' की उपाधि दी थी। अब ऐसे नेता कहाँ रहे।
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