8.3.07

शांतिभाई, देखो अब शांति है!

पहले से कहे देता हुँ भाई, लम्बा भी हो सकता है, अरूचिपूर्ण भी हो सकता है, इसलिए कटना है तो अभी से कट लो.

मन की पीडा को शांत करने का सर्वोत्तम उपाय अब हम सबके पास है, चिट्ठा लिखो और शान्ति की गेरेंटी पाओ. अब भगवान के द्वार कौन जाए, यहीं समाधान मिल जाता है. है कि नहीं...

मेरे पीडीत मन को भी मिल रहा है लिखते समय.

आज नारद कितना अच्छा लग रहा है, शांत, कितनी विविधता पूर्ण पोस्टें.. सुकून मिलता है.. अब शांति है राहत है...

मैं भी मेरे मन को शांत कर लुं, बेहतर है....

भाषाई ज्ञान:

एक बार बन्दर सिरीज में मैने लिख दिया था, फटती है. बडी भूल कर दी थी. मेरे भाषाई ज्ञान पर सवाल उठ खडे हुए. साहित्यिक भाषा की दुहाई दे दी गई. मुझे बडी ग्लानी हुई मेरी लेखनी पर.

उन्मुक्तजी के लेख का तो ऐसा असर हुआ मुझपर कि मैने बन्दर सिरीज लिखना ही छोड दी.

पर अब समय बदल गया है. नई सुबह आ गई है. और लोकतंत्र विकसित हुआ है. अब चुतिया और उसके समकक्ष शब्दों का प्रयोग भी किया जा सकता है... दादा ने चर्चा ही चर्चा में ऐसा रामबाण चूरण खिलाया है कि अब किसीको (आर.एस.एस. वालों को भी) मन्दाग्नि होने का कोई चांस नहीं, भाई.

काश वो पहले ही खिला देते... नहीं......?




उपमा ही उपमा:

अपनी एक चौथाई सदी की जिन्दगी में मैने मेरे (हमारे) लिए इतनी उपमाएँ नहीं सुनी जितनी चिट्ठाजगत में आने के बाद सुनी. हा हा हा हा...

कभी मैं मेलोड्रामिक हो जाता हुँ, कभी मोदी भक्त, कभी आर.एस.एस. वाला, बिना सिंग का चौपाया हुँ, सखी सम्प्रदायी भी हुआ हुँ...

वाह, मैं कृतार्थ हुआ. इतनी उपमाएँ मिलने के बाद अब मुझे भारत रत्न क्यों ना दे दिया जाए?

भाई मुझे या तो इंसान रहने दो या लगे तो बन्दर ही बना दो. कोई एक फीगर तो रखो.. है कि नहीं... वैसे भी बुद्धिजीवी इंसान होने से बन्दर होना अच्छा है मेरे लिए. क्यों?


हाय मैं गुजराती:

यह एक और मुसिबत है. गुजरात में रहना, और गुणगान गाना. लोगबाग कहते हैं आप मोदी के गुजरात के, कोई कहे गान्धी के गुजरात के, कोई कहे तु गुजराती, कोई कहे सिर्फ गुजरात के....

यार ये क्या मोदी गुजरात गान्धी गुजरात किए रहते हो... गुजरात एक प्रदेश है. ना तो मोदी की बपौती है ना गान्धी की बपौती है. नहीं है ना?

एक बात सोचो मेरे भाई, गांधीजी को बापु किसने बनाया? देश की जनता ने बनाया ना? तो मोदी को भी मुख्यमंत्री प्रदेश की जनता ने ही तो बनाया है. खुद थोडे ही चढ बैठा है. जनता को नहीं मजा आएगा तो उतार फेंकेगी कुर्सी से और क्या! दिल्ली बैठे आपका पेट काहे कुलबुलाता है? लगे तो चूरण खा लो भाई, मन्दांग्नि शांत हो जाएगी.


कटाक्ष:

कटाक्ष करते रहते हैं कि मैं मोदी समर्थक हुँ. लो सुन लो भाई, हाँ हुँ. आज हुँ.

मेरे जैसा लगभग हर गुजराती युवा मोदी का समर्थन करता है, क्योंकि यहाँ आई.टी, इंफ्रास्ट्रक्चर, और रोजगार का विकास हुआ है. भ्रष्टाचार कम हुआ है. कल को कोई भ्रष्टाचार का मामला या और कोई पहलु सामने आया तो अपने नहीं करेंगे समर्थन, नही देंगे वोट. कल की गेरेंटी नहीं है. किसी और को भी चुन लेंगे. वैसे भी नेता का परमानेंट सपोर्ट मूर्ख ही करेगा. मोदी कोई तोप थोडे ही है!!


सो बात की एक बात:

मेरा मन कहता है मुझसे अब शांति है, शांत रहो.. मौज करो.

और कुलबुलाए कीडा तो चिंता नहीं. नारद अब परिपक्व है. चाहे जितना चुतियापा करो, चाहे जितनी फाडनी है फाडो, चाहे जितना पक्षपात करना है करो, वाट लगाओ, खाट खडी करो...

नाम तुम्हारा आज भी है, कल भी रहेगा. पर मेरे भाई आज सदनाम है, कल बदनाम हो जाओगे.

जरा सोचो, क्या पाओगे?

16 Comments:

Anonymous Anonymous said...

बहुत अच्‍छे दोस्‍त। आपके पास एक बेहतरीन शैली है अपनी बात कहने की। लेकिन मेरी भी एक बात। क़त्‍लोगारत की बुनियाद पर कोई भी विकास बदबूदार होता है। बहरहाल जो विकास आप गुजरात में देख रहे हैं, विकास की वैसी लहर पूरे देश में है। कुछ लोग ज्‍यादा अमीर हो रहे हैं और ज्‍यादा लोग और भी ज्‍यादा ग़रीब हो रहे हैं। गुजरात में साक्षरता दर की जानकारी दें और ये भी बताएं कि गरीबी रेखा से नीचे के लोग आपके सूबे में कितने फीसद हैं।

1:26 PM, March 08, 2007  
Blogger amitabh tripathi said...

अविनाश की टिप्पणी पूर्वाग्रह से ग्रस्त है। इन्हें गुजरात के विकास में बदबू आ रही है। लेकिन यदि इनसे कोई कहे कि केरल, उत्तर प्रदेश में इनकी सेकुलर सरकारों ने मराड में या मऊ में जो दंगे कराये और उनमें हिन्दू मारे गये तो ऐसी सरकारों पर उनकी क्या प्रतिक्रिया है तो कहेंगे छोड़ी पुरानी बातें विकास की बात करें।

1:48 PM, March 08, 2007  
Blogger Divine India said...

पंकज भाई,
हंस रहा हूँ… :) :)
बहुत सलीकेदार ढंग से जवाब दिया है और
मामला शांत होना ही था इतना जो माहौल
गर्म हो गया था…। मोदी चाहे जो हों पर विकास
के मामले में कांगेस भी गुजरात को N0.1 मानती है सोनिया जी नहीं मेरे पास Rajiv Ghandhi Foundation की एक पत्रिका है जिसमें यह माना गया है…।
धन्यवाद!!!

2:24 PM, March 08, 2007  
Blogger अनूप शुक्ल said...

नाटी ब्वाय बोले तो शरारती बालक!और भी तमाम अच्छे शब्द आये इस बीच वो भी सीखो!

3:55 PM, March 08, 2007  
Blogger पंकज बेंगाणी said...

@ अविनाश,


मित्र बदबू आती है तो आप नाक पर पट्टी बान्ध लें जैसे आँखो पर बान्ध रखी है.


आपके साथ समस्या यह है कि आपको सिर्फ नकारात्मक दिखता है. मैं भी जानता हुँ गुजरात की साक्षरता दर क्या है. पर हम पोजिटीव चिजें भी देखते हैं मेरे भाई. आप बताओ कौन कौन से राज्य तरक्की कर रहे हैं? कर्णाटक, आन्ध्र, महाराष्ट्र यही सब ना... क्या इन राज्यों में कोई समस्या नहीं?

हम खूश हैं बन्धू, मौज करो आप भी.



@ अमिताभ,


एक बात सही है लेकिन. हमें सचमुच आगे की देखनी चाहिए.. पर हमें मजबूर किया जाता है कि पीछे की चीजें कुरेदनी पडती है.



@ द्वियाभ,


चलिए हंसे तो फंसे.. हा हा हा



@ अनुप चाचु,


मैं तो अनुज हुँ, आप से ही सिखता हुँ. आप जैसे वरिष्ठ अभिभावक जो सिखाएंगे वही सिख लेंगे हम तो. जिस रास्ते कहेंगे चल पडेंगे. ;-)

4:08 PM, March 08, 2007  
Anonymous Anonymous said...

शान्ति सेठ
किसके सामने यह सब कह रहे हो? जिन लोगों को "फटती है" शब्द पर आपत्ति है पर "चूतिया "कर्णप्रिय लगता है, उनको?
गुजरात की बात करते समय इन लोगों को पश्चिम बंगाल की साक्षरता और गरीबी की सीमा रेखा नहीं दिखती। दुनियाँ जानती है कि कहाँ कितनी साक्षरता है।
जिस हिंसा की बुनियाद पर मार्क्सवाद और लेनिनवाद का जन्म हुआ और जिसकी वजह से जितनी कत्लोगारत हुई वो इन अंधों को नहीं दिखती, आज इसी मार्क्सवाद की अवैध संतान के रूप में माओवाद रोज की कितनी हत्य़ा कर रहा है? क्या फरक पड़ता है? मरे तो मरे!! वे तो इनके मार्कस्वाद के चमचे जो ठहरे। यही गुजरा्त में हुई हत्याएं अगर माओवादियो ने की होती तो ये सब बिना बरसात के मेंढ़कों की तरह मांद में घुस जाते। या उन हत्याओं को जायज ठहराते।
हाँ पर गुजरात में हुई हत्याएं सबको दिखती है। यानि माओवादी हत्या करे तो अच्छा, मार्कस्वादी करे तो बहुत अच्छा और गोधरा में हिन्दूओं को जिन्दा जला दिया जाये, उससे महान कार्य कोई हो ही नहीं सकता।
थू है इन घटिया लोगों की मानसिकता पर, देश को असली खतरा पाकिस्तान , चीन या किसी और से नहीं है, अगर है तो इन जैसे घटिया लोगों से है, चिट्ठाजगत में आग लगाने वाले इन लोगों से है। अस्ली देश द्रोही अगर कोई तो यह लोग है।
ये लोग फूट डालने आये हैं, बताइये क्यों अचानक एक के बाद एक ये लोग कहाँ से फूट पड़े? और सबसे पहले हिन्दू मुसलमान जैसा विवादित मुद्दा छेड़ा? दरअसल वामवादियों की अनौरस संतानों को कोई भी अच्छा कार्य होता फूटी आँख नहीं सुहाता और नारद तहा हिन्दी चिट्ठाजगत अचा खासा प्रगति पर है तो यह कैसे सहन कर लेंगे?
सब चूतिया हिन्दी ब्लॉगर नहीं समझे इनकी चाल तो अनर्थ होना है ही।
संभलो अब भी देर नहीं हुई है।

4:29 PM, March 08, 2007  
Blogger ghughutibasuti said...

अच्छा लिखा है । कुछ शब्दों को छोड़ दो तो ! सात वर्ष पहले मैं गुजरात आई थी और तब से यहीं हूँ । क्षमा करना किन्तु भारत के १६ से अधिक प्रदेश देख चुकी हूँ , १२ से अधिक में रह चुकी हूँ , सो शायद मुझे कहने का थोड़ा सा अधिकार बनता है । जब यहाँ आई थी तो समाचार पत्रों में कम अपराध की घटनाएँ होती थीं । इतना सुरक्षित मैंने स्वयं को कहीं भी नहीं पाया था । फिर आया भूचाल और मैं गुजरातियों के बड़े हृदय से बहुत प्रभावित हुई । जितनी स्वतंत्रता ,सम्मान व सुरक्षा स्त्रियों को यहाँ है, भारत में कहीं नहीं है । यहाँ के लोग बुद्धिमान, स्वाभिमानी, कर्मठ हैं । अपना भाग्य स्वयं बदलते हैं । सामन्तवादियों को हर बात का दोषी ठहराने मे समय नहीं बरबाद करते । अच्छे लोग हैं । दूसरे राज्यों से आए लोगों को परदेसी नहीं महसूस करवाते । मैं बहुत खुश थी ।
फिर आया वह पागलपन जिसने मुझे अपने आप, अपने धर्म व भारतीयता पर लज्जित कर दिया । माना डिब्बा जलाना गलत था । जिन्होंने जलाया था उन्हें सजा देते , मोदी जी की सरकार थी , पकड़ते उन्हें ! किन्तु नहीं, वह शेर और मैमने की कहानी दोहराई गई । किसी के किए की सजा किसी और को दी गई । मैं स्तब्ध थी । फिर वही बात, जैसा कि मैंने अपनी कविता में कहा है, 'यह मैं भी तो हो सकती थी ।' मैंने अपना धर्म सब धर्मों को पढ़कर सोच विचार करके नहीं चुना था । ठीक वेसे ही अधिकतर लोग किसी धर्म में जन्म लेते हैं, किसी देश, रंग में जन्म लेते हैं अतः उन्हें उसके लिए सजा देना गलत है । जब भी आप स्वयं को किसी अन्य के स्थान पर रख कर देखेंगे तो आप अत्याचार नहीं कर सकेगें । यदि हर महिला स्वयं को उन बेबस मुसलमान औरतों के स्थान पर रख कर देखतीं तो वे अपने पति, भाई, पिता को रोकतीं । किन्तु वे तो यह सब मूक हो देख रही थीं या फिर मुसलमानों की दुकान लूटने में बढ़ चढ़ कर हिस्सा ले रहीं थीं ।
जिस बात ने सबसे अधिक मुझे उद्वेलित किया वह थी आम आदमी का यह उत्तर कि जो हो रहा है ठीक हो रहा है । और भूकम्प के समय सब तरह के उत्सव स्थगित हो गए थे , पर तब वे सब चलते रहे, जैसे जो हो रहा था उससे हमारा कोई लेना देना ही नहीं था । जो जीवित जलाए जा रहे थे वे हमारे कुछ नहीं लगते थे । तो यदि उनमें से कुछ आतंक की राह पकड़े तो क्या आश्चर्य है ? और आज मैं केसे स्वयं को कहीं भी सुरक्षित समझ सकती हूँ ? मैं क्या गारंटी दे सकती हूँ कि कोई उत्तराखंडी, कोई ब्राह्मण, मेरे पति, भाभी, चाची, जवाईं आदि की जाति , धर्म या प्रदेश का व्यक्ति कोई भी आगजनी , अन्याय आदि नहीं करेगा ? और जब करेगा तो उसकी सजा उन्हें या उनसे सम्बन्ध रखने के लिए मुझे नहीं मिलेगी । सो कोई भी बंगाली, पंजाबी, बिहारी, मराठी, राजस्थानी, कन्नड़,तेलगू, मुसलमान, ईसाई, अमेरिकन, कनेडियन ,पोलिश, या रुसी कहीं कोई गड़बड़ी करे तो आप मुझे भी मार सकते हैं । फिर आप सब भी तो मेरे अपने हैं , सो यदि आप अपराध करे तो मुझे सूली पर चढ़ाया जा सकता है । फिर मैं तो माँ और अध्यापक वर्ग की प्रतिनिधी भी हूँ , अतः सबसे पहले तो सजा की अधिकारी मैं हूँ । मैंने व मुझ जैसों ने आपको बनाया है, अच्छों को भी व हत्यारों को भी । सो लज्जा से मेरा सिर झुक गया था । हमारे पास एक मुसलमान महिला रहती थीं, सदा सोचती थी उन्हें कैसा लगता होगा । उन्हें फोन करती थी व अपनी विवशता पर क्षमा याचना भी करती थी ।
गुजरात कई बातों में महान है व मैं उसपर गर्व करती हूँ । बस कोई इस दाग को मिटा दे । कोई यह दिलासा दे दे कि हत्यारे व रेपिस्ट अपने कारनामे दुबारा नहीं दोहराएँगे ।
हाँ , यह सब सब जगह होता है पर इसका मतलब यह नहीं कि गुजरात भी इस दौड़ में भाग लेने को भाग पड़े ।
घुघूती बासूती

5:16 PM, March 08, 2007  
Blogger पंकज बेंगाणी said...

@ घुघुति जी,

अच्छा लिखा आपने, बहुत अच्छा. इसे पोस्ट के रूप में लिखती तो और भी अच्छा होता.

लेकिन हमने कब गोधरा के बाद के दंगो का समर्थन किया है? कभी नहीं किया. लेकिन जो बीत गया है, उसे क्यों बार बार रटा जाता है? क्यों? गोधरा ही क्यों? दिल्ली, भागलपुर, मऊ क्यों नहीं? गोधरा दंगो की असली भूमिका किसने कैसे तैयार की यह भी जानना जरूरी है...

मुसलमान मरे थे.. दर्दनाक भी है क्योंकि इंसान मरे थे.. पर हिन्दु भी कईओं बार मरे थे... उनमें से कितनो के रिश्तेदार आंतकवादी बने.. बोलिए तो....

मेरा रोष उन लोगो पर है जो खुद डाकु है और चोर चोर चिल्लाते फिरते हैं.

आप तो सात साल से हैं, मैं तो बचपन से हुँ... यहाँ के कण कण से वाकिफ हुँ... यह तो आप भी स्विकार करती हैं कि, गुजरात जितना सुरक्षित कोई और प्रदेश नहीं. तो क्यों एक दाग के लिए हर समय... हर समय... हर समय युँ गालीयाँ खाते रहें? क्यों?

मै गुजरात के विकास की बात करूं तो जाने कितनो को गोधरा याद आ जाता है.. कितनो को बदबू की शिकायत हो जाती है...

क्या करें आज हम बोलिये... क्या करें..? आगे की देखें कि नहीं.. जो हुआ वो आज हो रहा है क्या? तो क्या करें.. किसका सपोर्ट करें.. वो जो विकास के लिए काम कर रहा है या उस पार्टी का जिसके प्रादेशिक नेता अपने में ही उलझे रहते हैं! क्या करें बोलिए... क्या करे प्रदेश की जनता?

कोई तो मुख्यमंत्री होगा ही, मोदी नहीं तो कोई और.. काम इतना नही करेगा तो थोडा तो करेगा.. पर क्या तब भी हमें गोधरा का अपमान भूलने नहीं दिया जाएगा? ये छद्म सेक्युलरी आपको दूध के धूले दिखते हैं? इनका एजेंडा क्या है आपको पता नहीं है?

5:43 PM, March 08, 2007  
Blogger Sagar Chand Nahar said...

गुजरात में दंगे तो पहले भी कई बार हुए है। भरुच और बड़ौदा अति संवेदनशील माने जाते रहे हैं।
दंगे हुए और निर्दोष मरे बहुत ही शर्मनाक है। पर बार बार गुजरात को, मोदी को और हिन्दुओं को इस घटना के लिये दोष देना भी गलत है। गोधरा में ट्रेन जलने के बाद स्वाभाविक था लोगों का उन्मादी होकर इस तरह की हरकतें करना। पर शुरुआत किसने की आज इस को कोई याद नहीं करता।
मैने कई बार आगे भी कहा है, कि मैं १५ साल सुरत में रहा हूँ और खुद मुसलमानों को मुसलमानों के घर- दुकान लूटते और आग जलाते देखा है, कोई मानेगा? नहीं मानेगा क्यों कि जिन्होने देखा नहीं वो मानेगा कैसे? फिर गुजरात दंगों के लिये मोदी को दोषी ठहराना सही कैसे मान लिया जाये?
दरअसल दंगाईयों का कोई मजहब नहीं होता और ना ही उन्मादियों का। गोधरा और शेष गुजरात में जो कुछ हुआ वह केवल उन्माद का नतीजा है। जो कुछ हुआ वह बहुत गलत है हिन्दू मरे या मुसलमान मरती इन्सानियत है।
यह लिखने के बाद मुझे भी मोदी भक्त माना जायेगा, क्यों कि जो मोदी की बात करता है वह मोदी भक्त होता है ऐसा नियम बना है आजकल चिट्ठाजगत में। वैसे सत्य यह है कि मैं ना अब गुजरात में रहता हूँ ना ही मोदी भक्त हूँ और ना ही मेरा खाना मोदी के घर से आता है।

7:16 PM, March 08, 2007  
Anonymous Anonymous said...

यार,
ढक्कनो की कमी थी क्या गुजरात मे जो एक तुम भी आ गये हो? तुम्हे और तुम्हारे जैसे लोगों को हर चीज़ उजली ही दिखाई देती है . क्योंकि तुम लोगो के पास दौलत है , उन्हे कैसे दिखाई देगी हर चीज़ उजली जिनके पास ना तो दौलत है और ना ही अपनी जान की कोई हिफ़ाज़त?
अच्छा सिर्फ़ एक बात बताओ
गोधरा के दंगो मे कितने हिदू मारे गाये और कितने मुसलमान?
सिर्फ़ यही एक बात बताओ.
लाशो पर बैठकर विकास नही होता , विकास संतुलित होता है और होना ही चाहिए क्योंकि संतुलित विकास का मतलब होता है सबको साथ लेकर चलना.
तुम तो यार हद ही कर देते हो..कौन सी दुनिया मे रहते हो?
तुम्हारा प्रेमी

7:52 PM, March 08, 2007  
Anonymous Anonymous said...

बेवकूफ़ लोगों का कही गाँव या शहर नही बसा होता है , बस ऐसे ही हमारे आस पास ही पाए जाते हैं .. क्यो पंकज भाई , अपने बारे मे आपका क्या ख़्याल है ?

8:04 PM, March 08, 2007  
Blogger Monika (Manya) said...

माफ़ कीजियेगा पंकज जी.. आपने लिखा जरूर अच्छा है..बासुति जी के शब्दों में कुछ शब्द छोङकर.. पर माफ़ कीजिये मुझे शंति तो कहीं नज़र नहीं आई.. और ना लगता है की ये पोस्ट लिखकर भी शांति मिली है... ये मुझे बासुति जी के चिट्ठे की टिप्प्णीयों को देखकर लगा.. मुझे आपके सभी विषयों में एक ही चीज दिखी 'भाङास'... हो सकता है मैं गलत हूं.. कुछ अन्य्था कहा तो क्षमा चाहती हूं.. पर मुझे ऐसा ही लगा पढकर.. चिट्ठे पर उठाये गये मुद्दों पर कुछ नहीं कहूंगी काफ़ी लोग हैं कहने वाले..

9:24 AM, March 09, 2007  
Blogger पंकज बेंगाणी said...

मान्याजी और घुघुतिजी,
मैने दो जगह गाली लिखी है, उसके लिए क्षमा चाहता हुँ.
पर यह जरूरी था लिखना, उनको इस चिज का अहसास कराने के लिए जो खुलकर समर्थन कर रहे हैं.

मान्याजी,
आपको शांति नजर नहीं आती, आपकी ईच्छा है.
आपका नजरीया है. आप अपनी जगह सही हैं, मैं अपनी जगह सही हुँ.

9:55 AM, March 09, 2007  
Blogger ePandit said...

"पहले से कहे देता हुँ भाई, लम्बा भी हो सकता है, अरूचिपूर्ण भी हो सकता है, इसलिए कटना है तो अभी से कट लो."

पूरी पोस्ट पढ़वाने का नया फंडा लगता है। ;)

बाकी भाई लोग मैं इस बारे में ज्यादा क्या बोलूँ। गुजरात के बारे में गुजरात वाले ही बेहतर बता सकते हैं। पर इतना जरुर है कि गुजरात में तो एक बार कुछ मुस्लिम मरे और कश्मीर में रोज हिन्दू-सिख मारे जा रहे हैं, मोहल्ले वालों और दूसरे धर्मनिरपेक्षों को वो क्यों नहीं दिखते।

मोदी बारे पंकज की बात का अनुमोदन करता हूँ:
"मोदी को भी मुख्यमंत्री प्रदेश की जनता ने ही तो बनाया है. खुद थोडे ही चढ बैठा है. जनता को नहीं मजा आएगा तो उतार फेंकेगी कुर्सी से और क्या!"

@सागर चंद नाहर,
"वैसे सत्य यह है कि मैं ना अब गुजरात में रहता हूँ ना ही मोदी भक्त हूँ और ना ही मेरा खाना मोदी के घर से आता है।"

भाई कोई स्कीम चल रही है क्या ऐसी। अपने पक्ष में लिखने वालों का मोदी खाना-पानी का इंतजाम करते हों तो मैं उनके पक्ष में लिखने को तैयार हूँ। :)

सागर भाई की अंतिम पंक्ति पढ़कर मजा आ गया।

5:12 PM, March 09, 2007  
Anonymous Anonymous said...

पंकज भाई इन्हें कोई नहीं समझा सकता क्योंकि ये धृतराष्ट्र हैं। इन्हें यह पता है कि दंगों के बाद लोग आतंकवादी बन जाते हैं परंतु क्या ये बता सकते हैं कि 1984 के दंगों में सिखों पर अत्याचार हुआ था और इसके बाद कितने सिख आतंकवादी बन गए। काश्मीर में हिन्दुओं पर जो बीती है उसके बाद उन्हें शरणार्थी शिविरों में रहना पड़ा और अंतत: अपना प्रदेश ही छोड़ कर जाना पड़ा। अविनाशजी बता सकते हैं कि क्या गुजरात से लगभग सभी मुसलमान पलायन कर गए हैं? काश्मीर में से कितने हिन्दुओं ने आतंकवाद का रास्ता अपनाया? भैया लाल रंग का चश्मा पहनोगे तो सब लाल ही लाल दिखाई देगा ना। चश्मा उतार कर देखो भारत को। हाँ, गुजरात एक सुरक्षित और बेहतर राज्य है।

2:46 PM, March 15, 2007  
Blogger Arun Arora said...

बैगानी भाई जब गोधरा कांड हुआ था संसद चल रही थी वहा इस समाचार के पहुचने पर यही सवाल उठा था कि ये अयोधया करने का गये थे
जो ये प्रतीत कर रहा था की सांसद कीमंशा ये जताने की थी जो हुआ ठीक हुआ अपन ने तो तभी कह दिया था आग मे घी डल गया राम भली करे
अगले दिन जब दंगा भडका तो सब को गुजरात दिखाई देने लगा
आज तक सारे धर्म निर्पेक्ष नेता ये ही सबित करने मे लगे है कि रेल मे जल कर मरने वाले दंगा कराने की नियत से तेल लेकर गाडी बैठे थे और खुद को आग लगा कर मर गये

4:06 PM, March 22, 2007  

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