24.1.06

गुजरात भूकंप के पाँच साल के बाद

क्या कोई तबाही किसी के लिए वरदान साबित हो सकती है? शायद ही कोई होगा जो ईस बात का समर्थन करेगा. पर कभी कभी अनहोनी नई संभवनाओं को जन्म दे देती है.

हमारे प्रदेश मे यही हुआ है. पाँच साल पहले आये विनाशक भूकंप मे गुजरात का कच्छ जिला पूरी तरह से तबाह हो चुका था. कयास लगाये जाने लगे थे कि अब शायद ही किसीमे हिम्मत बचेगी कि यँहा फिर से घर बसा सके. जान माल का भारी नुकशान हुआ था. गाँव के गाँव शमशान घाट मे बदल गये थे. अहमदाबाद पर भी कहर बरपा था. मुझे याद है वो मँजर. शायद कभी भूल नही पाउँगा. मै दौड कर नीचे आ रहा था. सडको पर लोग भाग रहे थे. सडक की Street Light बुरी तरह झुल रही थी. मैने देखा कि सामने वाली बहुमंजिला इमारत पर दरारें पड रही थी. अचानक मेरे पास खडी मेरी साथी बेहोश हो कर गिरने लगी. मै उसे थामने लगा पर मेरे भी पाँव लडखडा गये और हम दोनों गिर पडे. मेरा मोबाइल बंद हो चुका था. अचानक जोर से धमाका हुआ. मैने देखा दूर एक इमारत ढह रही थी. मैने घबराकर आँखे बंद कर ली. मेरे पीछे से तड तड की आवाजे आ रही थी. एक शुटकेश के शोरूम का सामान गिर रहा था. हम एक जर्जर इमारत के नीचे ही खडे थे. मैने प्रार्थना की, कहीं यह हम पर ना गिर जाए. एक बुजुर्ग व्यक्ति जोर जोर से चिल्ला रहा था. मुझे लगा उनको दिल का दौरा पडने वाला है. धरती से निकलती वो भयानक आवाजे याद आते ही आज भी पसिना छुट जाता है. यह सब कुछ ५० सेकेन्ड तक चला. फिर घडियाँ रूक गयी. ८ बज कर ५० मिनट. गुजरात तबाही की कगार पर आ गया था. पर यह् तो सिर्फ शुरूआत थी. असली चुनोती तो आगे आने वाली थी.

गुजरात को फिर से खडा होना था क्योंकि हिम्मत हार जाए वो गुजराती ही क्या.

गुजरात फिर से खडा हो चुका है. भुज, गांधीधाम, भचाऊ, अंजार, अहमदाबाद तबाही से उठ कर विकास की मिसाल पेश कर रहे है. कुछ महिनो पहले गांधीधाम जाने का मौका मिला. मै उत्साहित था कि भुकंप के कुछ अवशेष, कुछ निशानीयाँ शायद देख पाऊँ. पर मै गांधीधाम पहुचँ कर हैरान रह गया! वहाँ तो कुछ अलग ही तस्वीर थी. शानदार सडके, शोपिंग मोल्स, नई नई होटले और खुशहाल लोग. मैने अपने क्लाईंट को; जिनसे मिलने मै गया था; को पुछा तो उन्होने कहा," भूकंप तो एक तरह से वरदान लेकर आया था. हाँ जानहानी तो हुई पर सारे के सारे गाँव और शहर सुनियोजित तरिके से बस चुके है. लोग खुश है. जानहानी ना हो तो भगवान करे ऐसे भुकंप हर दस साल मे आने चाहिए." गांधीधाम की सडके विश्वस्तर की है. कहते है, नया भूज तो और भी अच्छा है. रास्ते मे मैने देखा भचाऊ, अंजार भी फिर से खडे हो चुके है. भूकंप का ना तो डर है ना ही नामोनिशान. अहमदाबाद भी विकास की नई ऊँचाईयों को छू रहा है (इसके बारे मे विस्तार से लिखुंगा).

इसे क्या कहेंगे? गुजरातीयों की हिम्म्त और आत्मविश्वास, गुजरात सरकार की कार्यकुशलता, लोगों का सहयोग ... और क्या.

हर बार - हर बार गोधरा का रोना रोने वालों को मेरी सलाह है आप गुजरात मे आकर रहकर देखिए. आपको भी ईस जमीँ से प्यार हो जाएगा.

मत भूलिए भारत ८ प्रतिशत GDP मे गुजरात का कितना योगदान है. गुजरात की GDP १५ से उपर है.

8 Comments:

Blogger संजय बेंगाणी said...

बहुत अच्छा लिखा हैं. आशा करता हूं ऐसे ही लेख आगे भी पढने को मिलेंगे. गुजरात की बात लिखने के लिए एक गुजराती होने के नाते साधूवाद देता हूं

8:08 PM, January 25, 2006  
Blogger Pratik Pandey said...

पंकज भाई, सही कह रहे हो। गुजरात आर्थिक उन्नति में दूसरे प्रान्‍तों के लिये एक मिसाल है। आपका राज्‍य भारत में सर्वाधिक विदेशी निवेश आकर्षित करता है। लेकिन फिर भी इस बात से इन्‍कार नहीं किया जा सकता, कि गुजरात में मज़हबी स्‍वतन्‍त्रता का दमन किया जा रहा है।

8:26 PM, January 25, 2006  
Blogger पंकज बेंगाणी said...

आपने लिखा कि गुजरात में मजहबी स्वतंत्रता का हनन हो रहा हैं. क्या मैं जान सकता हूं आप किस मजहब की बात कर रहें हैं? यहां तो लगभग सभी धर्म के अनुयायी रह रहे हैं, मैं स्वयं जैन हूं. क्षमा करे लेकिन अगर आपको लगता हैं कि मुसलमानो के प्रति मजहबी स्वतंत्रता का हनन हो रहा हैं तो स्पष्ट लिखने में संकोच कैसा. जब कभी सुनता हूं अल्पसंख्यको को आरक्षण दिया जायेगा, तब भी यही सोचता हूं ये किस अल्पसंख्यक की बात कर रहे हैं. ये जैन हैं, सिख हैं, इसाई हैं या फिर सुपर अल्पसंख्यक पारसी है? नहीं, ये अल्पसंख्यको में बहूसंख्यक मुसलमान हैं, तो स्पष्ट कहने में हिचकिचाहट क्यों? साफ साफ कहो हम मुसलमानो को आरक्षण देना चाहते हैं. कोई आपका क्या उखाङ लेगा, सिवाय सर्वोच्च अदालत के.
अब में आपकी बात पर आता हूं, मैं अपको भरोसा दिलाता हूं कि हमारे गुजरात में ऐसा कुछ नहीं हो रहा हैं. आप कभी मौका मिलने पर यहां आइये और स्वयं देखले, या फिर मेरे कुछ मित्रो का जो कि मुसलमान हैं के पते भेज सकता हूं आप उनसे समपर्क कर सकते हैं. जो भी करें लेकिन अपने मन से यह वहम निकाल दें.
मैं इसी बात पर कुछ और लिखने की अनुमति चाहूंगा.
हमने दंगे देखे हैं, उन्हे झेला हैं. लेकिन अहमदाबाद में ऐसा पहली बार नहीं हुआ था. अंग्रेजो के आने से भी पहले भी यहां दंगे होते रहे हैं. अभी १५-२० साल पहले तो यह शहर ६-६ महिनो तक कर्फ्यु में रहा था. हमेंशा मरने वाले अधिसंख्य हिन्दू थे इस बार के अलावा. यह इतिहास हैं, मैं दगों का समर्थन नहीं कर रहा. कर भी नहीं सकता क्योकि इनमें मरने वाला अंततः इन्सान होता हैं.
अहमदाबाद की तरह दंगे भागलपूर में भी हुए थे, दिल्ली में भी हुए थे. जो जिम्मेदार थे वे सत्ता में हैं. कोई नहीं कहता वहां मजहबी स्वतंत्रता का हनन हो रहा हैं, फिर यहां के लिए क्यों?
यहां नमाज़ अदा करने से कोई नहीं रोकता, ईद धूमधाम से मनाई जाती हैं, ताजिये निकते हैं,मदरसे चले रहे हैं और क्या चाहिए मजहबी स्वतंत्रता के लिए.
आप माने या न माने पर गुजरात के मुसलमान अन्य प्रन्तो के मुकाबले ज्यादा समृद्ध हैं, अगर यहां दमन हो रहा होता तो ऐसा सम्भव नहीं होता और यहां से मुसलमान कश्मीरी पंडितो कि तरह पलायन कर जाते.
आपको याद होगा एक व्यक्ति की तस्वीर हाथ जोङ कर रोते हुए की अखबारों में छपी थी और बंगाल सरकार उसे अपने राज्य में ले गयी थी, उसे विश्वविध्यालयों में घुमाया गया. फिर घर भी दिया गया शायद नोकरी भी दी थी. वह बंदा भी वापीस गुजरात लौट आया हैं. क्या यही घटना काफी कुछ नहीं कह जाती.
सबसे ज्यादा साम्प्रदायिकता का लांछन लालूप्रसादजी लगाया करते थे. गर्व से कहते मैंने और कुछ भले ही न किया हो पर राज्य में साम्प्रदायिक दंगे नहीं होने दिये. इधर उनके राज्य के बच्चे यहां घरों में जुठे बरतन मांज कर अपना बचपन बरबाद कर रहें हैं. ऐसे कथीत साम्प्रदायिक सौहार्दय को क्या चाटे? क्या धर्मनिरपेक्षता के दावे करने वाले राज्यो में लङकीयां रात के बारह बजे अकेली निकल सकती हैं? अगर नहीं तो यकिन मानिये वहां से ज्यादा हमारे यहां कानुन का राज हैं.

8:08 PM, January 26, 2006  
Blogger Jitendra Chaudhary said...

सही कहा पंकज भाई,
जो हिम्मत हार जाए वो गुजराती ही क्या|
गुजरात ने मिसाल कायम की है, देश के विकास मे उसका बहुत बड़ा योगदान है। ईश्वर करे देश का हर प्रदेश ऐसा ही विकास करे।

मै भी गुजरात मे काफ़ी घूमा हूँ, विशेषकर जैतपुर,जूनागढ,पोरबन्दर और वेरावल एरिया में। बहुत अच्छे लोग, उद्योग धन्धों के लिये माकूल माहौल।

9:07 PM, January 26, 2006  
Blogger Jitendra Chaudhary said...

सही कहा पंकज भाई,
जो हिम्मत हार जाए वो गुजराती ही क्या|
गुजरात ने मिसाल कायम की है, देश के विकास मे उसका बहुत बड़ा योगदान है। ईश्वर करे देश का हर प्रदेश ऐसा ही विकास करे।

मै भी गुजरात मे काफ़ी घूमा हूँ, विशेषकर जैतपुर,जूनागढ,पोरबन्दर और वेरावल एरिया में। बहुत अच्छे लोग, उद्योग धन्धों के लिये माकूल माहौल।

9:08 PM, January 26, 2006  
Blogger Pratik Pandey said...

पंकज भाई, आपने अपने पक्ष को बहुत पुख्‍ता तरीके से रखा है और मैं आपके तर्कों को स्‍वीकार करता हूँ। मेरी इस सोच का कारण शायद तथाक‍थित धर्मनिर्पेक्ष दलों का गुजरात के खिलाफ़ दुष्‍प्रचार ही रहा होगा। गुजरात की सही तस्‍वीर सामने रखने के लिये साधुवाद।
और जहाँ तक अमित जी तल्‍ख प्रतिक्रिया का प्रश्न है, मैं कहना चाहूँगा कि आप उसकी चिन्ता न करें और अनवरत लेखन जारी रखें।

12:37 PM, January 27, 2006  
Blogger पंकज बेंगाणी said...

धन्यवाद प्रतिक,

यकिन मानिए कथाकथित धर्मनिर्पेक्ष दल कहीं ज्यादा साम्प्रदायिक है. हिन्दुओं की, हिन्दुत्व की बात करना साम्प्रदायिक्ता है क्या? क्या हिन्दु होना पाप है. कश्मीरी पंडितों को कोई पुछने वाला नही, और बस मुसलमानो का रोना रोये जाते हैं ये लोग. मै मुस्लीमों के खिलाफ नही हुँ, पर धर्मनिर्पेक्षिता के नाम पर होने वाले मुस्लीम तुस्टीकरण को कतई सहन नहि किया जा सकता है.

3:32 PM, January 28, 2006  
Anonymous Anonymous said...

अभी 7 मार्च एवं 6 अप्रेल 2006 को आए भूकंपों ने एक बार फिर से गुजरात को डरा दिया है.

मुकेश पन्डया, राजकोट

6:48 PM, April 16, 2006  

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