८ गुणो वाली प्रेमिका और मै
आशीषजी, यह क्या किया आपने? मुझे क्यो बकरा बना दिया? आप बडे बडे बकरो के बीच मे मुझ जैसे मेमने का क्या काम. आप सब तो महारथी हो, नही नही लिखने मे तो हो ही, प्रेम के PHD धारी भी हो. मै ठहरा निष्फल प्रेमी. क्यो जगहँसाई करवाना चाहते है! नही भाई छुपाना कैसा? जब लिखना ही है तो लिख ही डाले ना! ज्यादा तो नहि पर थोडी छुपाछुपी खेलनी पडेगी. क्या करूँ, किसिने केश ठोक दिया तो. जबरदस्ती मारा जाऊँगा. सारी की सारी ब्लोगगिरी धरी कि धरी रह जाएगी. और नहि तो क्या!
पहले ८ गुण वाली बात पर आता हुँ. यार ये आठ गुण ही क्यों? १६ क्यो नहि पुछा? देखिए ना नारी १६ श्रृंगार करती है ना? बस वे ही तो गुण होते है उनमें! सच्ची बात है ना? भगवान ने नारी को सुंदरता दी, हमे उन्हे देखने वाली स्पेश्यल आँखे दी! कोई इसे नाम देता है, लाइन मारना? कर लो बात! लाइन तो लगती है, मरती कँहा है? सब लाइन लगाते है, कोई प्रत्यक्ष लगाता है (मेरे जैसा) कोई परोक्ष लगाने मे विश्वास रखता है. लगाएंगे सब! आखिर आँखे है तो देखने के लिए. जग मे कितनी खुबसुरती है. देखनी चाहिए कि नही? और फिर कदर भी करनी चाहिए. क्यों हम नही कहते, वाह शर्माजी आपकी गाडी तो बडी शानदार है! नही कहते कि, वाह शर्माजी आपके बगिचे के गुलाब तो बडे ही सुंदर है! क्या नही कहते कि, वाह शर्माजी आपकी नई टी.वी. तो बडी गजब की है. तो यह क्यो नही कह सकते, वाह शर्माजी आपकी नई बीवी तो बडी सुंदर है! सुंदर है तो सुंदर ही कहेंगे ना? बुरा मानने कि क्या बात है? पर नही, मान जाएँगे बुरा. जितनी गालीँया सिखी है, या नही सिखी तो आयातित सब दे डालेंगे. और कुछ नही तो कंहेगे, तेरे बाप का क्या जाता है? क्या करे अब इनका? सुंदर है तो सुंदर ही कहेंगे ना! चलो ठिक है by chance कह दें, चलिए शर्माजी आपकी नई बीवी बस ठिकठाक ही है, आप के साथ suit करती है! तो क्या बुरा नही मानेंगे? जरूर मानेंगे. बडी दिक्कत है जग में.
क्या आठ गुण गिनाऊँ प्रेमिका के? चलो देखते हैं:
१. नारी होनी चाहिए. (भई नर लोगो को बुरा मानने कि जरूरत नही है, आप भले ही मुझ पर लाइन मारो पर मेरा परदेश जाकर बसने का कोई मूड नही है, यहाँ इडिया मे यह सब allow नही है)
२. महा झेलू होनी चाहिए (मै बहुत पकाता हुँ. मुझे झेलना साधारण नारी के बस की बात नही)
३. पाक कला विशेषज्ञ होनी चाहिए. (हाँ जी, खाने पीने के अपने शोखीन. घर पर ही लजिज खाना मिले तो बाहर क्यो जाँए)
४. सोंदर्य विशेषज्ञ होनी चाहिए. (ताकि वे खुबसुरत बनी रहें और हम घर मे ही लाइन लगाते रहें. नही तो मुझे कोई problem नही है.)
५. ज्यादा चुँ चपड न करे. (हाँ तो, नही तो औरतो का मुँह कब बंद होता है? लिपस्टीक लगाते समय! नहीं तो all India Radio चलता ही रहता है.)
६. स्टाइल इंस्पेक्टर होनी चाहिए (खा गए ना गच्चा? अब यह क्या है? जी हाँ, अपने को सलिका सिखाने वाली मिले तो वारे न्यारे. नही तो क्या है, मै तो पाजामे में ही बाहर चला जाता हुँ. कोई हो जो कहे, क्या है यह्? बाल तो बनाओ.)
७. हँसती रहे हँसाती रहे (हँसना सेहत के लिए जरूरी है साहब, कुछ तो पोसिटिव हो ना)
८. आखिर में, सुंदर होनी चाहिए (मैने पहले कहा था ना, एक ही तो गुण होता है औरतो में. यह भी ना हो तो फिर खाली पिली टेंशन क्योंकर लेंगे)
हम्म्म्म, हो गये आठ गुण... चलो अब राज कि बात बता देता हुँ. ये सब हमारी श्रीमतीजी मे है. नही तो किस शादिशुदा व्यक्ति मे इतनी हिम्मत होती है कि पत्नी के गुणो क अलावा कुछ और भी लिखे. हाँ भई मुझे तो मेरी बिवी से बडा डर लगता है. वाह लो, मिल गई खुशी सुनकर? क्यों आपको नही लगता क्या? तो शरमाना कैसा. dont be shy! और जो कुँवारे खुशनसिब पढ रहे है, ज्यादा खुश मत हो, हर कुत्ते के दिन आते है.
वैसे लिखना तो प्रेमिका के बारे में था. क्या करे शादी के बात तो बिवी ही घोषित प्रेमिका होती है ना!
वैसे प्रेम तो हमने बहुत किए. सच्ची! क्लास ७ से ही लाईनमारू हो गया था. क्लास की सबसे सुंदर बाला सुश्री म को दिल दे बैठा. वैसे लाईन तो उसे स्कुल के सारे समझदार लडके मारते थे, पर मै भाग्यशाली था. क्योकि वो मेरे पास बैठती थी. मुझसे होमवर्क करवाती थी. मेरा नास्ता खाती थी. मेरी पुस्तक से कोपी करती थी. अब इतनी समझ थोडे ही होती थी कि मेरा use करती थी. फिर भी सब लडके मुझसे जलते थे, और मै अपने को कनैया से कम ना समझता था. फिर एक दिन वो आई ही नही. फिर दो दिन ना आई. फिर महिना गुजर गया. फिर पता चला, उसका बाप सबको लेकर गाँव भाग गया. प्रेमकथा १ समाप्त.
फिर क्लास १० मे, क्लास की सबसे बुद्धिसम्पन्न बाला सुश्री स से भी प्यार हो गया. वो भी थोडी बहुत interested लगती थी. पर इस बार पास पास बैठने जैसा कुछ ना था. वो उस कोने मे, मै इस कोने मे. बस आँखो ही आँखो मे ईशारा हो गया. और इतना ही रहा. फाइनल परिक्षा के बाद ना जाने वो कँहा चली गई. और मै वँही रह गया.
फिर Multimedia की पढाई के समय सुश्री अ थी. एकदम टोम क्रुज ईस्टाइल. मै उसके स्कुटर के पीछे बैठता था. वो मुझे बस स्टेंड तक drop करती थी. इतनी खराब scooter चलाती थी की रास्ते मे पचास जगह ठोकती थी. पर गाली बेचारा सामने वाला ही खाता था. मै तो जितनी देर उसके पीछे बैठता था, हनुमान चालिसा पढता था. पर क्या करू, कम्बख्त दिल. फिर भी उसके साथ scooter पर ride करना आनंद देता था. एक दिन बोली चल तुझे किसी से मिलवाती हुँ. हाँ साहब आज वो कोई उसका पति परमेश्वर है.
फिर एक लास्ट और थी. मेरी सबसे अच्छी मित्र सुश्री स. पहले दोस्ती, फिर गहरी दोस्ती, फिर प्यार. एकदम फिल्मी स्टाईल. कभी कुछ कहा नही, कभी सुना नही. एक दिन एक रेस्तरां मे पूछ ही डाला," मुझसे शादी करोगी?" उसका चेहरा सफेद, अवाक. पर फिर कहा "हाँ". बस इतना ही. उसके बाद इंटरवल के बाद की फिल्म फिर शुरू हो गई. खानदान मे समस्या. नही मेरे नही उसके. मै मारवाडी, वो बंगाली. क्या कहें. हो गई कयामत से कयामत तक. खल्लास.
और आज, भई वो भी खुश, हम भी खुश. वो गुडगांव अपने ससुराल, हम अहमदाबाद अपने पिहर. आज कभी-कभी chat कर लेते है. दोस्ती तो नही ही टुटी.
फिर कई साल बाद एक बार लास्ट प्यार हुआ. हौले हौले. मेरी माँ कि पसंद की लडकी से. धीरे धीरे
प्यार. और ईस बार हारा नही. वो सुश्री नही नही, श्रीमती बेंगानी आज हमारे साथ है.
कथा समाप्त.
और अब हमारी बकरा सुची:
१. भाईसाहब संजयजी
१. भाईसाहब संजयजी
२. परममित्र रविजी
३. आशिषजी
४. प्रतिकभाई
५. जितुजी
६. ई-स्वामीजी
७. कालीचरणजी
८. तरूणजी
९. ग्रेग गोल्डींग साहब
१०. सारीकाजी

6 Comments:
आशीषजी, यह क्या किया आपने? मुझे क्यो बकरा बना दिया? आप बडे बडे बकरो के बीच मे मुझ जैसे मेमने का क्या काम.
क्यों झूठ बोल रिए हो भईये, प्रत्यक्षा जी के ब्लॉग पर तो बड़े उछल रिए थे कि "मुझे भी शिकार बनाओ मुझे भी शिकार बनाओ"!! ;)
यार ये आठ गुण ही क्यों? १६ क्यो नहि पुछा?
आठ इसलिए कहा कि कई लोग लिखने के मामले में बड़े कंजूस होते हैं, आठ लिखने भी उन्हे भारी पड़ लेते हैं। अगर ज्यादा लिखना चाहते हो तो लिखो न, मैंने भी तो ग्यारह लिखे हैं!! :)
ये सब हमारी श्रीमतीजी मे है
यार, मुझे समझ नहीं आता कि ज्यादातर हर कोई अपनी पत्नी से डरता क्यों है? ;) हर शादीशुदा बन्दा यही राग अलाप रिया है, अरे कोई तो असली मर्द मिले जो ठोक कर कह सके कि जो गुण उसे चाहिए वे उसकी पत्नी में नहीं हैं!! ;) :P LOL
"लगता है आपने तो PHD कर रखी है इस विषय मे. मै भी भाग ले सकता हु क्या?"
मैने यह लिखा था प्रत्यक्षाजी के ब्लोग पर. इसमे उछलने वाली बात कहाँ है जरा बताएंगे!!
क्यों झूठ बोल रिए हो भईये, प्रत्यक्षा जी के ब्लॉग पर तो बड़े उछल रिए थे कि "मुझे भी शिकार बनाओ मुझे भी शिकार बनाओ"!! ;)
यार ये आठ गुण ही क्यों? १६ क्यो नहि पुछा?
आठ इसलिए कहा कि कई लोग लिखने के मामले में बड़े कंजूस होते हैं, आठ लिखने भी उन्हे भारी पड़ लेते हैं। अगर ज्यादा लिखना चाहते हो तो लिखो न, मैंने भी तो ग्यारह लिखे हैं!! :)
तो कौन सा तीर मार लिया अमित आपने :)
यार, मुझे समझ नहीं आता कि ज्यादातर हर कोई अपनी पत्नी से डरता क्यों है? ;) हर शादीशुदा बन्दा यही राग अलाप रिया है, अरे कोई तो असली मर्द मिले जो ठोक कर कह सके कि जो गुण उसे चाहिए वे उसकी पत्नी में नहीं हैं!! ;) :P LOL
सब आप जैसे दुखियारे नही होते ना!! :)
पंकज भाई, बुरा न माने, मैंने अपनी टिप्पणी किसी बुरे इरादे से नहीं दी थी, महज मज़ाक के लहजे में लिखी थी। यदि आपको बुरा लगा तो क्षमा चाहूँगा और यदि आपको पसंद नहीं तो कभी दोबारा आपके चिट्ठे पर अपनी टिप्पणी नहीं दूँगा।
ऐसी बात नही है. शायद जब से हम दोनो के बीच नारद को लेकर तकरार हुई है, मै आपको वांछित रूप से स्विकार करने मे असमर्थ पाता हुँ. बुरा तो लगा है, पर its ok!! जख्म भरने मे वक्त लगता है
मैंने उस समय भी कहा था और अब भी कह रहा हूँ, यदि आप मेरे स्थान पर होते तो वही कहते जो मैंने कहा था, यदि आप मेरे प्रति विषाद को अपने मन से निकाल कर मेरे कथन को दोबारा पढ़ें तो आप पाएँगे कि मैंने कोई भी आपत्तिजनक बात नहीं कही, न ही कुछ गलत कहा।
बहरहाल, उस बात को एक दुस्वप्न की भांति भूल जाना ही श्रेष्ठ है, मैं तो अब उस बात को भूल भी चुका था कि आपने स्मरण करा दिया। भूल जाईये और एक नई शुरूआत करते हैं। :)
पंकज भाई, आपकी बकरा सूची में अपना नाम भी देखा; लेकिन इस बाबत कुछ न लिख पाने के लिये माफ़ी चाहता हूँ। क्योंकि मेरा कम्प्यूटर ख़राब हो गया था और इस वजह से मैं कई दिनों से हिन्दी चिट्ठा मण्डल की गतिविधियों से नावाकिफ़ था।
Post a Comment
Subscribe to Post Comments [Atom]
<< Home