5.12.06

नरेन्द्र मोदी की छाया तले

एक महापुरूष ने अपने चिट्ठे पर लिखा :

नरेन्द्र मोदी की छाया तले बैठकर ,
अपने व्यसाय के हानि-लाभ के मद्देनजर,
गांधी को गरियाना एक बात है और उन पर गंभीर बहस करना दूसरी बात है .

लिखने वाले गुणी एवं सम्मानित व्यक्ति हैं इसलिए मेरी यह उत्कंठा जागी कि भई उन्होने यह किसके लिए लिखा है?

वैसे सन्दर्भ था पिछले कुछ दिनों से चली आ रही गान्धीजी की चर्चा, जिसे नाहर भाईसा से शुरू किया था। थोडा तो गान्धीजी को उन्होने "गरियाया" था। और थोडा मेरे बीग बी और थोडा बहुत मैने। कुछ लोगों ने बाहर से समर्थन भी दिया था।

तो ऐसा लगता है कि उपरोक्त टिप्पणी हमारे लिए ही है। या नही भी हो सकती है, पर हिन्दी चिट्ठामंडली में शायद मै ही हुँ जो मोदी की छाया तले हुँ तो सोचा कि चलो थोडा वेरिफिकेशन जैसा कर लिया जाए।

पहली बात तो यह कि गान्धी को गरियाना आखिर होता क्या है? गान्धीजी की कुछेक नितियों का विरोध करना गरियाना होता है यह तो अब पता चला! क्या हमारे लोकतंत्र ने हमे यह अधिकार नहीं दिया है कि हम अपनी बात खुलकर रख सकें? बिल्कुल दिया है। तो इसमें गरियाने वाली बात किधर से आई?

गान्धीजी सचमुच महात्मा थे। उनके जैसा बनना तो दूर उनके नक्शे कदम पर चलना भी बडी बात है। पर क्या वो सर्वगुण सम्पन्न थे? क्या कोई हो सकता है?

आज गान्धीजी हमारे बीच जिवित नहीं हैं। हम उनसे जवाब नहीं मांग सकते, पर हम घटनाओं का विश्लेषण तो कर ही सकते हैं जो हमें इतिहास में दर्ज मिलती है।

जो इतिहास आपने पढा है वही हमने पढा है। बस विश्लेषण का तरीका अलग है। क्योंकि सबकी सोच अलग अलग होती है। पर इसका मतलब यह नहीं कि आप किसीको एक व्यक्ति विशेष के साथ जबरदस्ती जोड दें।

कुछ अति बुद्धिजीवी लोगों को मोदी से जाने क्या तकलीफ है? हर जगह मोदी को क्यों घसीटा जाता है? क्या वे इतने मह्त्वपूर्ण व्यक्ति हैं? या देशद्रोही हैं? क्या हैं?

एक और चीज जो नही समझ पाया वो यह कि गान्धीजी को "गरियाने" से व्यवसायिक लाभ या हानि कैसे होती है? परंतु शायद गलती मेरी ही है, क्योंकि मेरी समझ अफलातुन नहीं है, मैं समझ नहीं पाता।

कुछ ऐसे लोग जिनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य झंडे उठाकर विरोध प्रदर्शन करना हैं उन्हे क्या पता कि व्यवसाय करना कितना कठीन होता है। दो पैसे कमाकर घर चला कर दिखाइए पहले फिर पूंजीपतियों को गालीयाँ दिजीए।

अच्छे और बुरे हर जगह होते हैं, पर इसको सबके साथ कैसे जोडा जा सकता है। कुछ पुंजीवादी जरूर सामंतवादी मानसिकता के होंगे पर क्या इससे सारे व्यवसायी खराब हो जाते हैं? माफ किजीए दुकानें तो इन समाजवादीयो ने भी खोल रखी हैं बस नाम समाजसेवा का देते हैं।

नरेन्द्र मोदी का विरोध सबसे अधिक शायद इसलिए होता है क्योंकि गोधरा कांड के बाद कथित रूप उन्होने हिन्दुवादी कट्टरपंथीयों और पुलिस को खुली छूट दी थी। इसमें कितनी सच्चाई है वो गुजरात में रहने वाला ही जान सकता है।

दिल्ली में बैठकर कोहराम मचाने वालों को आभास हो रहा था कि पुरा गुजरात जल रहा है, पर हकिकत में 5% गुजरात भी नहीं जल रहा था।

लेकिन मैं इमानदारी से कहता हुँ, मोदी ने छूट दी थी। यह सच है। गोधरा में ट्रेन जलाने की घटना से एक समुदाय विशेष बहुत आहत हुआ था। गुस्सा फूट पडा था। और फिर जो हुआ वो और भी शर्मनाक था। मोदी इस जगह नैतिक रूप से गलत हैं।

मै उन्हे अन्य राजनेताओं से नही जोडता नहीं तो आसानी से कह सकता हुँ कि किसने ऐसा नही किया?

लेकिन उस एक काले अध्याय को छोडकर उन्होने और जो कुछ भी किया उसकी वजह से ही वे आज भी लोकप्रिय हैं। प्रशासन ने और आम जनता ने दंगो से सबक लेकर और यह समझ कर कि इससे पुरे समाज को नुकशान है अपनी मानसिकता बदली है।

पहले हर छः महिने में अहमदाबाद के पुराने शहर में दंगे होते थे, आज गोधरा के बाद कोई मामुली झडप भी नहीं हुई। 21 साल बाद जगन्नाथ यात्रा के दौरान मुसलमानों ने अपनी दुकाने बन्द नहीं रखी और मिठाई बाँटी। आज यहाँ सुकुन है, शांति है। कहते थे कि मुसलमान चले जाएंगे... गुजरात बरबाद हो जाएगा, क्या हुआ? कोई गया? गुजरात कश्मीर नही है जहाँ से हिन्दुओं को लात मारकर निकाल दिया गया और फुटपाथ पर ला दिया गया।

मोदी के रूप में गुजरात को ऐसा मुख्यमंत्री मिला है जिनकी एक सोच है, विजन है और जो कर्मठ है। मै उनका गुणगान नही कर रहा पर मैने केशुभाई को भी देखा है और चिमनभाई को भी। और विपक्षी नेताओं को भी।

आप गुणवान हैं, महापुरूष हैं, अफलातुन हैं

मैं आम नागरीक हुँ, "मोदी की छत्रछाया" में सुरक्षित और खुश हुँ।

13 Comments:

Blogger Udan Tashtari said...

बहुत सधे हुए परिपक्व तरीके के साथ आपने अपनी बात कही है। वैचारिक मतभेद तो मानव स्वभाव है और वो तो होते ही रहेंगे मगर संयम बनाये रखना महानता का द्योतक है। आप निश्चित रुप से सुरक्षित और खुश रहेंगे। शुभकामनाऐं एवं बधाई।

7:10 PM, December 05, 2006  
Anonymous Anonymous said...

इस लेख को बिना शर्त समर्थन है। :-)


कुछ बड़े नेता के चम्‍मचों की धारणा है कि इस देश गांधी परिवार और कुछ विशेष लोगों तक ही महान होना लिखा है। इनके अलावां न कोई महान कार्य कर सकता है न महान बन सकता है। अगर कोई इस प्रकार का कार्य किया जाता है तो उसे महानता की श्रेणी नही दिया जा सकता है, अगर दिया गया तो इसका व्‍यापक स्‍तर पर विरोध किया जायेगा। इस्‍तीफा देने के लिये प्रर्दशन किया जायेगा। अगर यह भी हुआ तो संसद तो है कि और हमारे बाप दादा काहे लिये धारा 356 छोड़ गये है संख्‍या बल पर है उसे महान नही बनने देगे।

7:20 PM, December 05, 2006  
Blogger अफ़लातून said...

'मतभेद' को मनभेद न बनाने का शुक्रिया .
मैं अभिव्यक्ति को दबाने मेँ नही मानता,इसलिए उस प्रविष्टि पर आपकी प्रतिक्रिया दो दिन पहले से मौजूद है.मैँ प्रियंकर की सृजन शिल्पी के चिट्ठे पर टिप्पणियोँ से सहमत हूँ और उन्हेँ एक अलग प्रविष्टि के रूप मेँ छापने की किसी पाठक की मांग पर,मैँने छाप दिया.
मैं भी बें गाणी नही हूं.

8:10 PM, December 05, 2006  
Anonymous Anonymous said...

पंकज भाई
मैं गुजरात में १५ साल रहा हूँ और कम से कम ६ मुख्यमंत्री देखे हैं यह महसूस हुआ कि उनमें से नरेन्द्र मोदी देश के सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री हैं इसमें कोई शक नहीं, अगर गोधरा कांड के बाद गांधीजी के सिद्धान्तों को लेकर ( एक गाल पर थप्पड मारे तो दूसरा गाल आगे कर दो वाला) बैठे रहते तो शायद आज गुजरात में हर दिन गोधरा की तरह ट्रेन जला करती। जो हुआ शर्मनाक हुआ था पर नहीं होता तो शायद आज हिन्दूओं का जीना दुभर हो जाता, इसका सबसे बड़ा उदाहरण कश्मीर है।
ढोंगी समाजवादियों और साम्यवादियों का काम हर अच्छे काम में टांग खींचना ही है।
गांधीजी के सिद्धान्तों का विरोध कर मैने कोई गलती नहीं की, मेरे चिठ्ठे पर आई टिप्पणीयों से साफ़ स्पष्ट होता है कि देश में मुझ जैसे करोड़ों लोग गांधीजी के सिद्धान्तों से या उनको महान मानने से सहमत नहीं है तो क्या वे सारे गद्दार हो गये?
रही बात पूंजीवाद का विरोध करने कि तो मैं मानता हूँ कि कभी कभी खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे वाली बात ही चरिता्र्थ होती है, जो लोग सफ़ल नहीं हो पाते वे ही पूंजीवाद का विरोध करते हैं।
लगता है अब बात निकली है तो दूर तलक जायेगी......

8:58 PM, December 05, 2006  
Anonymous Anonymous said...

पंकज भाई. आपके संयमपूर्ण लेख के लिए आपको साधुवाद। गांधीजी व किसी के भी सिद्धान्तों का विरोध करना कतई बुरा नहीं हो सकता।

"गुजरात कश्मीर नही है जहाँ से हिन्दुओं को लात मारकर निकाल दिया गया और फुटपाथ पर ला दिया गया।"

यह काश्मीर से तुलना करके एवं गुजरात में वर्तमान शान्ति के बारे में बता कर आपने कम से कम मेरे मन को तो शांत व प्रसन्न कर दिया।

10:20 PM, December 05, 2006  
Blogger Kaul said...

मैं आप के विचारों से पूरी तरह सहमत हूँ। गान्धी के विचारों से असहमत होने का नरेन्द्र मोदी की छत्रछाया तले होने से वास्ता नहीं है, और न ही हानि लाभ को देखना पाप है। गान्धी जी के विचारों से असहमति देश के किसी भी प्रदेश में दिखाई जा सकती है। हमारे देश की कई मुसीबतों के लिए एक गुजरात के महापुरुष और एक कश्मीरी पंडित ज़िम्मेदार हैं।

5:10 AM, December 06, 2006  
Anonymous Anonymous said...

वैचारिक मत-भेद तो सदा से ही रहे हैं और आगे भी रहेंगे।

परिपक्व तरीके से लेख लिखने के लिये बधाई।

6:35 AM, December 06, 2006  
Blogger अनूप शुक्ल said...

पंकज भाई,
अफलातून जी समाजवादी हैं। उनकी अपनी सोच है। और उसके हिसाब से अपनी बात कहते हैं। उनकी टिप्पणी पर यह पोस्ट भी उचित ही रही। मैंने गुजरात को अखबारों के माध्यम से देखा, टेलीविजन के द्वारा देखा। वहां की सरकार ने बहुत अच्छे काम किये होंगे बहुत सफलता से चल रही होगी वहां शासन व्यवस्था। लेकिन हमारे दिमाग में वो चित्र नहीं भूलते जिनमें समाज के मध्यवर्ग के लोग अपनी कारों में लूट का सामान भर रहे हैं। तलवारें लहरा रहे हैं और भी तमाम ऐसे काम जो भारतीय समाज में पहली बार हुये। दंगे पहले भी होते थे, सरकारें पहले भी उदासीन रहती थीं यह हमारे समाज की जानीपहचानी बात थी। लेकिन ऐसा पहली बार हुआ कि सरकार ने जानबूझकर दंगे जारी रहने दिये। खैर, यह सब आपने देखा है और माना कि गलत था। समाजवाद, साम्यवाद के बारे में आपके विचार जो हैं वे जरूर किसी अनुभव से बने होंगे। इसके बारे में टिप्पणी में नहीं लिखा जा सकता है इसलिये उस पर फिर कभी विस्तार से!

8:32 AM, December 06, 2006  
Blogger पंकज बेंगाणी said...

लालाजी, धन्यवाद। सब लोग सयंमता की तारीफ कर रहे हैं, इस चीज ने मुझे सचेत किया है।

महाशक्ति भाई,

आप भी मेरी तरह युवा है और आपका खून भी गर्म है। ;-)

अफलातुन महोदय,

मेरा किसी से मनभेद नहीं है। मैं अफलातुन नहीं हो सकता और आप बेंगाणी नहीं हो सकते पर हम दोनों भारतीय पहले हैं। आपके बारे में मुझे सागर भाईसा से जानने को मिला है। खुशी हुई। आप अपने प्रयासों में सफल हों ऐसी मेरी मंगल कामना है।

भाईसा, आपका समर्थन बहुत कम लोग करेंगे। पर मैं करूंगा।

मुकेशभाई, अनुरागजी, रमणजी धन्यवाद। रमण जी भारत की समस्याओं के लिए कश्मीरी पंडित कैसे जिम्मेदार हैं? कृपया अवगत कराएँ।

अनूपजी,

मैं आपकी बहुत ईज्जत करता हुँ। आपकी बात सर आँखो पर।
"समाजवाद, साम्यवाद के बारे में आपके विचार जो हैं वे जरूर किसी अनुभव से बने होंगे"

जी सही है।

12:53 PM, December 06, 2006  
Anonymous Anonymous said...

गांधी जी की नीतियों से विरोध किसी का भी हो सकता है . पर जब उनकी नीयत पर ही शक किया जाने लगे तो बहस के लिए जगह कहां बचती है ?

2:57 PM, December 06, 2006  
Anonymous Anonymous said...

रमण जी भारत की समस्याओं के लिए कश्मीरी पंडित कैसे जिम्मेदार हैं? कृपया अवगत कराएँ।

क्षमा करें मुझे वाक्य को इस प्रकार लिखना चाहिए था - "हमारे देश की कई मुसीबतों के लिए गुजरात के एक महापुरुष और यूपी के एक कश्मीरी पंडित ज़िम्मेदार हैं।"

अब तो आप समझ गए होंगे। जी हाँ गान्धी-नेहरू की जोड़ी की ही बात कर रहा हूँ।

अनूप जी, शायद सरकार ने इसी प्रकार की उपेक्षा 1984 के सिख विरोधी दंगों में की थी।

10:05 PM, December 06, 2006  
Anonymous Anonymous said...

पिछला कमेंट मेरा था, जो ग़लती से मैं ने बिना लॉग-इन किए किया।

10:20 PM, December 06, 2006  
Anonymous Anonymous said...

रमणः गुजरात के एक महापुरुष से आपका इशारा मैंने पटेल की ओर सोचा था, भला हो आपने स्पष्ट कर दिया।

पंकज, अफलातूनः बहस अच्छी है, विचारों का सामने आना बेहद ज़रूरी है। बस अच्छा हो कि व्यक्ति नहीं विचारों की ही बात हो, नाम लेकर बहस करने से बहस में दूसरे लोगों को खुली बहस में शामिल होने में हिचक होती रहेगी।

11:01 AM, December 20, 2006  

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