14.12.06

बन्दर चला "महान" बनने

एक गुजराती बन्दर गुलाटी मारता हुआ उत्तम प्रदेश के जंगल में पहुँच गया और अपने आका तीसमार खाँ लंगूर से मिला।


बन्दर: ताऊ

तीसमार खाँ: क्या है बे?


ताऊ मुझे महान बनना है।

क्या!! तुझे महान बनना है?


हाँ ताऊ। क्यों? मुझमें कोई कमी है क्या।

नहीं बे। महान बनने के लिए कोई क्वालिटी की जरूरत ही कहाँ है छुटकु। ए ल्लो, आसानी से बना देंगे तुझे महान।


सच्ची ताऊ?

हाँ बच्चा, टेंशन फ्री हो जा थोडी देर के लिए।


ठीक है ताऊ। अब क्या करुं?

ह्म्म्म... पहले तो अपनी शक्ल आईने में देख।


क्यों ताऊ? अच्छी तो है! रोज नहाता हुँ।

वही तकलीफ है मुन्ना!! रोज नहाना छोड पहले। 10 15 दिन में नहाया कर। मैला

कुचेला लगाकर। बुद्धिजीवी लगेगा।


सच्ची ताऊ?

और नहीं तो क्या। और ये क्या पहन रखा है रे? पेंट शर्ट... स्साले अंगरेज की औलाद! कल जाकर झब्बा, कुर्ता और पाजाम खरीद। और सुनिओ.. थोडा मैला हो तो अच्छा।


जी अच्छा ताऊ, फिर रोज धोऊंगा भी नहीं।

समझदार है मेरा बच्चा... एकदम सही। ज्योर्ज फर्नाडिस को देखा है ना।


हाँ, उनके जैसे कपडे पहनुं?

ना.. वो तो फिर भी अच्छे हैं। वो मानक है मेरे भाई! उससे कहीं गन्दे होने चाहिए।


जी अच्छा ताऊ।

फिर कुछ झोले खरीद, लटकाने के काम आएँगे। फिर रंग बिरंगे झंडे खरीद, वो लहराने के काम आएँगे।


वाह वाह मजा आ गया ताऊ। आगे क्या करूं?

हम्म... बेटा फिर..... हाँ..... तुझे ना एक पंजीकृत राजनैतिक दल जैसा कुछ खोलना होगा।


ताऊ, एन.जी.ओ. नही चलेगा?

धत्त.. बुडबक है क्या बे? फिर राजनीति की रोटियॉ कौन तेरा ताऊ सेंकेगा?


हाँ.. बात तो खरी कही ताऊ। और नाम क्या रखुं पार्टी का?

कुछ भी रख ले! की फरक पैन्दा है? ह्म्म... कोई समाजवादी जन उत्क्रांति, समाजवादी प्रजाति पार्टी, समाजवादी संक्रांति दल जैसा कुछ रख ले।


ओके.. ताऊ.. डन।

ये डन.. फन... छोड दे बेटा.. अंग्रेज लगेगा।


जी अच्छा ताऊ। फिर मार्केटिंग कैसे करेंगे।

हाँ अब तु लाइन पर आ रहा है। देख सबसे पहले ना, तु सीधा शेर से पंगा ले, हंमेशा उसकी निंदा कर, यही राजनीति होती है।


शेर ? अरे बाप रे!!!

क्यों, डरता है क्या बे?


नहीं.... डरते तो अपने किसी से नहीं। पर ताऊ शेर तो दो चार ही है। किसे ललकारुं?

ह्म्म.. सीधा दढीयल शेर को ललकार।


क्या.............? ताऊ, वो तो बहुत खतरनाक है!! और उसके पीछे पाँच करोड गधे भी हैं।

अबे मुरख... पाँच करोड़ हो कि सात करोड़! हैं तो गधे ही ना?


हाँ ताऊ।

देखो हम लोग उन्ही को कोसते हैं। वे जो घास चारा ढोकर लाते हैं, उसे खाते हैं और स्साले उन्ही को लताडते हैं... खी..खी...खी।


ही...ही...ही.. ताऊ। तुस्सी ग्रेट हो।

हाँ मेरे बन्दरु, और उस शेर के साथ भले ही गधे हों हमारे साथ तो हर जंगल में भरे पडे मानवाधिकारी सियार हैं। हमें क्यों डर लगे।


ताऊ.. वो सब तो ठीक है। लेकिन.............सिर्फ विरोध करने से क्या होगा। मेरा घर चलाने के लिए क्या करूं? पार्टी शार्टी अपनी जगह है, घर भी चलाना पडेगा ना।

तो क्या सोचा है तुने मेरे बन्दरु? जरा मैं भी सुनुं!


ताऊ सोचता हुँ, कोई छोटा मोटा व्यवसाय कर लुं।

क्या...... अबे मुरख..... स्साले..... मति भ्रष्ट हो गई क्या रे तेरी? व्यापार करेगा!! लोगों का खून चुसेगा? समाजवाद का क्या होगा रे?


लेकिन ताऊ, मैने कब कहा लोगों का खून चुसुंगा? मैं तो उल्टा लोगों को रोजगार दुंगा।

मैं तो उलता लोगों को लोजगाल दुंगा..... ह्म्म्म.... फिर अपनी पार्टी क्या खाक चलाएगा! तु खुद सोच ले बेटा। तुझे कौन सी दुकान चलानी है। समाजवाद की या व्यवसाय की?


ताऊ, मैं तो वही करूंगा जो आप कहोगे।

हाँ, तो अच्छा बच्चा बन जा और समाजवादी दुकान खोल ले। तेरा घर भी ओटोमेटिक चल जाएगा और महान भी बन जाएगा।


जी अच्छा ताऊ। फिर अपना काम तो निकल पडेगा ना?

अबे.. तुफान मेल की तरह दौडेगा बन्दरु। यहाँ उत्तम प्रदेश में क्या कमी है रे? देख कमाई की चिंता बिलकुल ना करीयो। और फिर मनोरंजन की दरकार हो तो अपने सरदार मुखमंत्री के दरबार में तो बकायदा रंडीयाँ नाचती हैं। दिल बहल जाएगा। और फिर बेटा... सरदार ने भाडे पर एक मोटा ताज़ा दल्ला भी ले रखा है। स्साला पुरी दुनिया की पँचायती करता फिरता है... तो अपने काम ना आएगा क्या?


ये तो खरी कही ताऊ। आपके चरण कहाँ हैं चूम लेना चाहता हुँ।

चुम्मा चाटी बाद में करियो। एक बात दिमाग में घुसेड ले बन्दरु। अपने को सबका विरोध करना है... सबका... जरूरत पडे तो अपने मुखमंत्री का भी। हम तोप हैं बाकी सब पर प्रकोप हैं ... समझ गया ना। और सुन... वो खाकी हाफ पेंट वाले हैं ना... स्साले उनकी तो बजा कर रखनी हैं.. चाहे कुछ भी हो जाये।


पर ताऊ वे लोग इतने भी बुरे भी नहीं हैं।

हट नालायक.... धन्धा क्या खाक करेगा। अबे दुकान चलानी है कि नहीं!! देख लोग व्यापार करते हैं हम धन्धा करते हैं। फर्क समझ।


समझ तो गया ताऊ.... पर।

पर क्या बे?


पर ताऊ... हम समाज को बांटने का काम नहीं कर रहे क्या? हम अन्याय नहीं कर रहे क्या?

इस बार लंगुर उछलकर दूर पेड पर जा बैठा और बन्दर को हिकारत भरी निगाह से देखने लगा और बोला तु बन्दर नहीं हो सकता। तु बन्दर का मुखौटा लगाकर आया हुआ गुजराती गधा तो नहीं? तु जरूर पंकज है।

7 Comments:

Anonymous Anonymous said...

वाह वाह ! पंकज भाई मजा आ गया, क्या बात कहने का अंदाज है :)

आपके विचारों से कोई सहमत हो या न हो, आपकी बात कहने का तरीका और पिछली पोस्टॊं में शालीनता से पेश की गई असहमती काबिले तारीफ है :)

12:19 PM, December 14, 2006  
Anonymous Anonymous said...

शैली जमी.शेखर सुमन की भी जमती है .

12:36 PM, December 14, 2006  
Anonymous Anonymous said...

बहुत बढिया :)

6:41 PM, December 14, 2006  
Blogger Udan Tashtari said...

शैली और लेखन में धार आती जा रही है. बंदर के रुप में तुम्हें चित्रित कर देखना काफी मनभावन रहा. मेरे विचार से अब कोई नया मुद्दा लिया जाये. :)

9:27 PM, December 14, 2006  
Anonymous Anonymous said...

अच्छी प्रतीकात्मक कथा है जी। आजकल 'महान' बनने का शार्टकट फॉर्मूला ही यही है कि हिंदुत्व और हिंदुवादियों का विरोध करो और समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष का तमगा पाओ। सच्चे समाजवादी तो जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया ही थे। आज के समाजवादी तो बस 'महान' हैं।

1:22 AM, December 15, 2006  
Anonymous Anonymous said...

व्यंग्य की 'मर्कट शैली' और 'मर्कट न्याय' दोनों मनोरंजक लगे . लिखते रहें .

3:32 PM, December 15, 2006  
Anonymous Anonymous said...

पंकज भाई,

मजा आ गया, आपकी लेखनी मे अब तेज धार आ गयी है।

मेरे ख्याल से ये आपकी सबसे बेहतरीन पोष्ट है !
इसे एक श्रंखला बना दे ! हीट रहेगी

3:08 PM, December 29, 2006  

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