एक बन्दर की उलझन-सुलझन
खुशी से लोटपोट होता हुआ काला-लाल-हरा बन्दर जिसे अपने समाजवादी होने पर गरूर है, उछलता कुदता खिलखिलाता हुआ अपने आका लंगूर के पास पहुँचा।
बन्दर: उस्ताद! छप्पर फाड दिया उस्ताद।
लंगूर: क्या है रे? अब किसका छप्पर फाड आए हो भाई। ऐसे ही मुश्किलें कम है क्या!
बन्दर: अरे क्या हुआ उस्ताद? मैं तो गप्प ठोक रहा था कि फाड दिया। वास्तव में तो हमारे मुखिया ने सबको झाड दिया, उस्ताद। कल सरे आम डिक्लेर कर दिया कि वो जंगल किंग है। खी खी खी।
लंगूर: अबे तो उछल क्यों रहा है। यह जगह कौन सी है?
बन्दर: उत्तम प्रदेश बीहड।
लंगूर: और यहाँ का रींग मास्टर कौन है।
बन्दर: अपने मुलायम से मुखिया।
लंगूर: तो जंगल का राजा कौन?
बन्दर: मुखियाजी!
लंगूर: तो उछलने की क्या बात है? अपने सरताज बेताज .. ना.. ना.. स-ताज राज कर रहे हैं बर्रुखदार। जीयो और जीने दो। सूरज उग गया है, उजाला फैल गया है। बाल गोपाल नाच रहे हैं।
बन्दर: बाल गोपाल!!!! आका अपने प्रदेश में बाल गोपाल खेलते थे, कुदते थे.. पर अब सुना है..उनकी निर्मम....
लंगूर: श...श..श... धीरे बोल.. आहिस्ता बोल.. लोग सुन लेंगे बन्दरु... कि.. यहाँ तो....
बन्दर: .... बाल गोपालों... की ही रास लीला हो गई।
लंगूर: श..श.. धीरे भाई मेरे... धीरे..... क्यों मुद्दा दे रहा है।
बन्दर: पर आका ऐसा कैसे हो गया? सरकार क्या कर रही थी।
लंगूर: होता है, जंगल में हर तरह के प्राणि होते हैं। कुछ वहशी भेडियों के भटकने से उत्तम प्रदेश को बदनाम ना कर। मुखिया बेचारा क्या क्या देखे।
बन्दर: सही है आका.. ऐसी तैसी स्साले गाली देने वालों की! अब अपने सेकुलर मराठा जंगल में द्रोपदी का सरेआम चीरहरण कर डाला मनचलों ने....तो वहाँ का मालिक क्या करे? क्यों?
लंगूर: वही तो... पर लोग मुढ है, समझते ही नहीं... फोगट की चिल्लपों...
बन्दर: लेकिन आका, फिर....
लंगूर: क्या बे?
बन्दर: ...फिर... कुछ धुन्धला धुन्धला सा याद आता है..... बीते जमाने में काहे आरोप लगे थे.... दढियल शेर.... बजरंगी बन्दर.... मनचले... कृष्ण....
लंगूर: श..स्स्स्स.... गडे मुर्दे मत उखाड.. रात गई बात गई... भूल जा उसे।
बन्दर: हाँ मेरे आका, बोलने वाले और सुनने वाले सब अपने ही हैं..
लंगूर: अब सही लाइन पकडी... खी खी... पर बेटा.. सो बात की एक बात...
बन्दर: वो करे तो बलात्कार....और... हम करें तो...
लंगूर: चमत्कार! चमत्कार बन्दरु.. चमत्कार हो गया...
बन्दर: आहा... चमत्कार हो गया..
लंगूर: नट नाच के बोला... फैल गया उजाला...
बन्दर: पर चिराग तले.....
लंगूर: श..स्स्स्स्स....स्स....स्स्स्स्स............

8 Comments:
मुखिया जी नोएडा भी नहीं जा रहे क्योंकि यह वहम है कि जो भी नोएडा जाता है उसकी कुर्सी चली जाती है। मगर लगता है नोएडा ना भी गये तब भी यही होने वाला है।
bhai,ur work seems to b good background for script..bcoz i m related to the area of films,so expecting more..
हैलो 'कल तक' न्यूज चैनल से संवाददाता गप्पीराम रिपोर्टिंग खबर मिली है कि उतम प्रदेश के बंदरों ने पंकज जी पर मानहानि का मुकदमा दायर करने का फैसला किया है। बंदरो के राजा मुलायम सिंह बाअदब ने इस सब को मराठा जंगल के राजा सुरेंद्र सिंह बोदी की साजिश करार दिया है। :)
बस, लगे रहो. :) :) पूरे मदारी हो गये हो, अच्छा नचा रहे हो बंदरों को. बीन बजाना और सीख लो, काम आयेगा. :)
@ जगदीशजी,
मुखियाजी के दिन लद गए अब... अब या तो केसरी बन्दर आएगा या नीली बन्दरीया...लोमडी देखो क्या करती है।
@ दिव्याभजी,
मै भी विज्ञापन उद्योग से हुँ। फिल्म और मल्टीमिडिया मेरा कार्यक्षैत्र है।
@ श्रीश,
गप्पीराम से बन्दरू का गठबन्धन करा लो... ऐश करोगे। ;)
@ लालाजी,
बीन बजाने का काम तो कई अन्य कर रहे हैं.. अपने तो ऐसे ही सुखी हैं। ;)
एक दूसरे लंगूर का कहना है कि छोटे छोटे शहर में ऐसी छोटी छोटी बातें तो होती रहती हैं.... जरूर मराठा मंदिर में ताजा ताजा दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे देख के आया होगा
बहुत अच्छे पंकज भाई ! लगे रहो !
बंदरमामा को नंगा करके नोइडा के बच्चो से पिटवाना चाहीये
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