कविराज को हँसाना है : बन्दर चला चुनाव जीतने
निवेदन:
इसे हल्के फुल्के मन से पढें।
मैने किसी चिट्ठाकार पर कोई व्यंग्य नहीं किया है।
मैने सिर्फ माहौल को हल्का फुल्का बनाने के लिए और हंसने हंसाने के लिए ही यह पोस्ट लिखी है।
मैने किसी भी आयोजन की गरिमा को ठेस पहुँचे ऐसा नहीं चाहा है। कृपया उतनी दूर तक ना सोचें।
अगर फिर भी आपको कुछ अखरता है तो कृपया टिप्पणी के द्वारा मुझे लताडने में संकोच ना करें। :)
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जंगल में यह खबर आग की तरह फैल गई। चुनाव आ गए चुनाव आ गए।
कपीशराज: क्या है रे... क्या है रे.... कौण सा चुनाव है भाई?
मास्टर छाप बन्दर: तु लग तो सलोना सा रहा है रे... कब पैदा हुआ?
कपीशराज: इसी साल.. हुकुम.. इसी साल, एक दम तरोताज़ा हुँ।
मास्टर छाप बन्दर: हाँ तो चल आ जा.. लगा ले लाइन.. हम एवोर्ड देंगे.. इस साल का खूबसुरत बन्दर।
कपीशराज: (उछलकर) ओहो... खी खी खी... किधर लगाऊँ लाइन।
मास्टर छाप बन्दर: उधर लगा ले... देख तेरे जैसे और भी हैं...
कपीशराज: इत्ते सारे!!! कित्तों को दोगे???
मास्टर छाप बन्दर: अबे.. डर काहे रहा है.. सबको ना देंगे... छाँट छाँट कर देंगे।
कपीशराज: ऐसा.. खी खी खी... अपने नहीं छँटने वाले... आहो जी आहो.. आहो जी आहो.... (नाचता हुआ लाइन लगाने पहुँचा)
मास्टर छाप बन्दर: देख लिज्यो.. कपीशराज और भी आइटम है।
कपीशराज लाइन में...........
कपीशराज: भाई.. वो आगे कौण सा आइटम है... लागे तो अपनी कौम का है.. पर हट्टा कट्टा है.. अपने तो दो हड्डी के हैं।
हरियाणवी बन्दर: बावळी बुच, गेल्लो हुग्यो के? बिलायती बन्दर है... केनेडा से आया है।
कपीशराज: (उछलकर पेड पर चढ गया)... उसको दूर कर.. उसको दूर कर... मन्ने डर लागे है।
हरियाणवी बन्दर: अबे... नीचे आ...नीचे आ बेटी के बाप.... कुछ ना करेगा... पाँच पंच परमेशर है तो सही।
कपीशराज: किधर है... मन्ने तो ना दिखे...
हरियाणवी बन्दर: तुझे सही चीज कब दिखती है...वो देख.. पाँच दरोगा.. वही पंच..देख तो ले एक बार..
कपीशराज: वो.. वो.. उत्तम प्रदेश वाला दरोगा कौण है.. मेरी फटती है उससे... लिख लिखकर धोता है सबकी...
हरियाणवी बन्दर: दो है... कौण सा बोलुं.. एक बालक बन्दरु है, एक बुढऊ है।
कपीशराज: वो जो फुरसत में रहता है। सबकी लगाता है। बु हु हु .. मन्ने निकाळ देगा।
हरियाणवी बन्दर: ना, नीचे आजा मेरे लाल... ना निकाळेगा.. और भी दरोगा है... देख एक बिलायती भी है... कुवैती बन्दरू। और मास्टर छाप बन्दर अखंड जंगलवादी बीग बी (बीग बन्दरू) भी हैं। आजा बेटा.. नीचे आजा।
कपीशराज: बेटा काहे बोला रे.... तु तो जंगल में नया आया है।
हरियाणवी बन्दर: रे.... अपणी तो बोली ऐसी है रे। आजा मेरे ताऊ नीचे आजा नहीं छँटणी हो जावेगी.. तु लटकता रहेगा।
केनेडियन बन्दर: कौन ही मिस्टर... ओ हेल्लु... मिस्टर केपीश... प्लीस काम डाऊन...
हरियाणवी बन्दर: काम डाउन.. उनका काम तो डाउन ही है....
केनेडियन बन्दर: यु... हमको हिन्डी भी आटा है। आइ मीन गुस्सा थूक दो.. देना है तो गुड लूक दो।
हरियाणवी बन्दर: हाँ...तो वैसे बोलो हर बात पे कवि काहे बनते हो।
कपीशराज: अबे ओ... काम किसका डाउन बोला बे...
हैदराबादी बन्दरू: भाई.. हल्ला मत मचाओ.. मै लाइन छोड दुंगा नहीं तो...
सब एक साथ: नहीं... नहीं... नहीं.... आप मत जाइए...
हैदराबादी बन्दरु: (हँसकर) नहीं जाता.. नहीं जाता... खी खी खी... अब तो आदत पड गई है.. ही ही....
कपीशराज: मै नीचे नहीं आता.. उस बिदेशी को बाहर निकालो पहले...
वकील बन्दर: नहीं जाएगा... वो बिदेशी नहीं है.. एन.आर.जे. है.. नोन रिलायबल जंगली...
केनेडियन बन्दर: कौन.. बोला.. उल्टा मिनिंग... नोन रेजिडेंशियल को नो रिलायबल.. बताएँ क्या हम है कितना एबल.. शरीर में डबल..
जग्गु भट्टी बन्दर: ना. ट्रीपल.. ट्रीपल..
केनेडियन बन्दर: ओके.. करेक्शन... शरीर में ट्रीपल.. और एवोर्ड जीतने में प्रबल..
हरियाणवी बन्दर: ओ भाई... तन्ने तकलीफ के है? कविता काहे ठोके है..मारे पल्ले ना पडे..
कपोलकल्पी बन्दर: कविता में क्या रखा है। समस्या उठाओ..पानी नहीं...घास नहीं... जंगल में मंगल नहीं... उठो.. जागो.. सृजन करो.. शिल्प बनाओ.. समस्या उठाओ।
हरियाणवी बन्दर: अरे.. समस्या कोई माधुरी दिछीत है के? उठा लुँ.. उठा तो लुँ... रखुँ किधर...
खुदाई बन्दर: उसके मत्थे पर रख दे.. खी खी खी खी...
कपीशराज: (पेड पर उछलकर) हाँ रख दे रख दे.. उपर से फोटु लेता हुँ।
कपोलकल्पी बन्दर: अबे तेरी फोटु खिंचु क्या नीचे से...
केनेडियन बन्दर: यस.. यस.. टुम खींचो फोटु, मई कविठा ठोकेगा...उस पर..
हरियाणवी बन्दर: तेरी कविता का ब्हाय रचाऊँ.. तु चुप हो जा.. नहीं तो करूं के जात बाहर।
खुदाई बन्दर: ओये एन.आर.जे. को गाली...नहीं चलेगी नहीं चलेगी।
फुरसती दरोगा: अरे... ए..ई.... च्चुप हो जाओ.. लगाऊँ क्या लँपड...और भईये.. ओ .. नीचे उतर, पेड पर लटकता रहेगा क्या।
कुवैती बन्दर: देखो भाई, अपने को टेंशन नहीं लेनेका... खुदा को देनेका.. जो उपर है वो उपर है.. बस।
हरियाणवी बन्दर: ओ भाई दरोगा.. तेरे केणे का के मतबल है? तु बोल रहा है वो जीत गया ऐसा...
कुवैती बन्दर: तु... तु तडाक करेगा तो आऊट... अपने को डिसिपलीन होना रे बाबा।
हरियाणवी बन्दर: रे.. अपणी तो बोली ऐसी है रे ताऊ... तु डंडा करता रे.. इन मनचलों पे..
बन्दर आगराबादी: तु.. चुप हो जा अब..डालुँ क्या कचराघर में?
हैदराबादी बन्दर: बाकी के किधर गए.. उनको पकडकर लाओ रे। दरोगा क्या कर रहे हैं। यह तो मेरा अपमान है। मैं चला...
सब: नहीं..... नहीं.... नहीं......
हैदराबादी बन्दर: खी... खी.... खी....(आँख मारकर) मैं क्या बोला था?
मास्टर छाप बन्दर: बातें कम काम ज्यादा।
हैदराबादी बन्दर: ये चबड चबड क्या खा रहे हो.. मुझे भी दो!!
मास्टर छाप बन्दर: अंगुर खा रहा हुँ.. नहीं दुंगा...
हरियाणवी बन्दर: अबे ओ.. लंगुर.. अंगुर... बाद में खाना.. पहले मन्ने चुन ले...
कपीशराज: (पेड से) तु क्या तोप है क्या.. चुन ले... मन्ने ले लो... मैं लायक हुँ...
मास्टर छाप बन्दर: चबड.. चबड... उसका ना.. चबड चबड... फैस्स्सला... चबड... माननीय.. चबड चबड... दरोगा मोदय... चबड करेंगे..
फुरसती बन्दर: कैसे खाता है रे... पहले खाना सीख बहुत गलती करता है...
मास्टर छाप बन्दर: लेकिन..चाचु... अभी कुछ दिन से ना.. ही ही.. चबड चबड.. आप भी ... थोडा तो ऐसे ही खा रहे हो...
फुरसती बन्दर: ओये.... (उछलकर) लगाऊँ क्या लम्पड... चुनाव रद्द....
मास्टर छाप बन्दर: नहींहीईही... माई बाप... छमा ... चबड चबड ... छमा...
फुरसती बन्दर: ह्म्म्म... गुड.. कंट्रोल में रहो वत्स.. बन्दरगीरी बन्द करो.. इंसान बन जाओ..
मास्टर छाप बन्दर: देर लगेगी चाचु... क्या करें... कालक्रम में होगा.. नियती में भी बन्दर बनना लिखा है.. खी खी खी...चबड...
जंगलवादी बन्दर: आहा.... लाइन लग गई लम्बी...हो गए सक्सेस...रिकोर्ड गए टुट.. करो अब रिसेस.. नहींस्स... मैं कविता नही कर सकता..मुझे भी संक्रमण लग गया..
हरियाणवी बन्दर: ओ भाई खुदाई... ओ.. अबला-टुन बन्दर ना दिखे है... कित्थे है...? लाइन लगाओ उसकी... खी खी खी...
खुदाई बन्दर: पता नहीं... नई पारटी खोलता दिखे है....
मास्टर छाप बन्दर: ओये.. उनके प्रति.. चबड..चबड.. अपने को शरदा.. है.. कोई कुछ ना कैगा..चबड..
सब हैरत से: कब से.....
मास्टर छाप बन्दर: फुरसती चाचु बोले तब से.....
तभी जोर से आवाज आई... आ...आ... आइइ...
सबने उपर देखा, कुवैती बन्दर कपीशराज को डंडा कर रहा था... अबे.. नीचे उतर.. नीचे उतर...
फुरसती बन्दर: अरे रहने दो भाई.. लटकने दो.. ना माने तो कोई क्या करे...
कपीशराज: उसको हटाओ.. उसको हटाओ...
दिल पर ना लगाएँ... :)

9 Comments:
पंकज भाई यह व्यंग्य कुछ सधा नहीं . कहीं-कहीं थोड़ा फ़ूहड़ भी हो गया . जैसे उत्तम प्रदेश वाले से 'फ़टती है' यह क्या भाषा हुई . आप जिम्मेदार व्यक्ति हैं कृपया भाषिक गिरावट पर ध्यान दें.
प्रसिद्ध कवि लीलाधर जगूड़ी अपनी एक कविता में प्रश्न करते हैं कि पहले मिजाज बिगड़ता है तब भाषा बिगड़ती है या पहले भाषा बिगड़ती है तब मिजाज बिगड़ता है .
@ प्रियंकर भाई,
मुझे कुछ स्पष्टिकरण देने चाहिए..
1. मैने किसी पर कोई व्यंग्य नहीं किया है। मैं सिर्फ माहौल को हल्का बनाना चाह्ता हुँ। मैने जिन लोगों पर भी ईशारा किया है, वे सभी सम्मानित एवं समझदार व्यक्ति हैं। मुझे लगता है कि यह लोग बुरा नहीं मानेंगे, इसिलिए इतनी स्वतंत्रता से कह पाया हुँ।
2. जितुजी, अनूपजी, सृजनजी, समीरजी का व्यक्तित्व इतना बडा है, उनपर व्यंग्य करना मेरे बस की बात ही नहीं है। मेरे जैसे अनुज उनसे सिखकर ही बडे हुए हैं। मेरी इतनी हिम्मत नहीं हो सकती कि उनपर टिका टिप्पणी करुं।
3. अफलातुनजी से मेरी कोई निजी शत्रुता या मनभेद जैसा हो ही नहीं सकता। उनके पिताजी का मैं बहुत सम्मान करता हुँ। अफलातुनजी की नितियों का मैं भले ही विरोध करता हुँ, पर मेरे मन में उनके प्रति बहुत श्रद्धा है। वे कर्मठ व्यक्ति हैं। उन्होने कभी मेरी बात का बुरा नहीं माना।
4. बाकि सब मेरे मित्र हैं, और मुझे अच्छी तरह से जानते हैं। इस लेख को सागर भाईसा ने पढा है, गिरीराज ने भी पढा है और दोनों खूब हँसे हैं। फिर उनसे चेट पर बात भी हुई और दोनों ने मुझसे काफी मस्ती की।
5. मेरा इरादा चुनाव की गरिमा को कम करना नहीं है।
6. मैने सिर्फ और सिर्फ मजाक के मूड में इसे लिखा है।
7. भाषा की गरिमा को ठेस पहुँच रही है, तो मैं सविनय क्षमा चाहता हुँ।
8. अगर आप लोग चाहें तो मैं इस पोस्ट को निकाल देता हुँ, और सार्वजनिक रूप से माफी मांग लेता हुँ। पर मुझे लगता है यह तिल के ताड बनाने जैसा होगा.... मैंने सिर्फ मस्ती के लिए इसे लिखा था ताकि सब हंसे...
सारे बन्दर तो ठीक थे अहमदाबादी और इलाहाबादी बन्दर कहॉं गये?
इन्हे चुनाव की कैमपेनिंग मे लगा दिया है।
समाईली है देख लो आखे खोल के
क्या दिख नही रहा है ऐनक का नम्बर ठीक करवाकर देखे।
पंकज भाई,
यह आपकी सबसे मजेदार पोस्ट रही, पढ़्कर बहुत आनन्द आया.
मगर आप द्वारा स्पष्टिकरण देना मुझे अच्छा नहीं लगा, हर किसी का व्यंग्य करने का अपना तरीका होता है. जहाँ फुरसतियाजी का हर एक आलेख हास्य के साथ-साथ शिक्षाप्रद होता है तो वहीं भाटिया जी मुन्ना-सर्किट पेट-फाड़क-यंत्र. आपका बन्दर विशेषांक भी व्यंग्य का एक विशेष-प्रकार का तरीका है. इसे जारी रखियेगा.
हेरा-फेरी, मालामाल वीकली हो या फिर अपना-सपना मनी-मनी, जवानी-दिवानी सभी दर्शकों को हँसाने के लिए बनाई गई है. अब यह बात दर्शकों पर निर्भर है कि वो कौनसी फ़िल्म देखकर हँसता है.
वैसे मुझे भी व्यक्तिगत रूप से यह अच्छा नहीं लगता कि हास्य के लिए किसी व्यक्ति विशेष को मोहरा बनाया जाये, मगर इसका तात्पर्य यह नहीं कि यह निरर्थक है, सबकी अपनी-अपनी पसंद-नापसंद होती है.
आपका प्रयास इस श्रेत्र में उत्तम है, पाठकों का हँसाने के लिए आप द्वारा किया गया प्रयास सराहनिय है. मगर मेरे चहरे पर तो सिर्फ मुस्कान है पर यकिं मानिये उसमें हँसी से कहीं ज्यादा ज़ान हैं. :-)
@ भाई प्रमेन्द्र,
अहमदाबादी दो दो बन्दर है तो सही.. :) कम हैं क्या?
@ गिरीभाई,
मुझे खुद को हर जगह स्पष्टिकरण देना नहीं जचता। पर क्या करुं? कुछ लोग अति व्यक्तिवादी हो जाते हैं.. उन्हे लगता है मैं उनका मजाक उडा रहा हुँ.. अरे भाई यह भी तो देखो कि मैं खुद भी बन्दर बना फिर रहा हुँ... वो नहीं देखेंगे!!
और कुछ नहीं तो मोदी से जोड देंगे.. हा हा हा..
मैं तो मोदी की भी बजाता हुँ.. पर सब में हिम्मत नहीं होती कि अपनी कमीयाँ भी देखें। इसलिए स्पष्टिकरण देना पडता है।
अरा वा भाई जी सा ऐग्या। रा मास्टर बांदर तूं किम्मे टेन्शन ना ले। आपणे हरियाणे मा तो फारमूला ई यो सै अक जिस गेल घणा प्यार होवै उसी की बजाये करैं। भाई आपणी तरफ ते तो फुल छूट सै जितणी बजाणी बजा ल्यो।
एक बात सै अक नाम कमै ग्या आपणा मास्टर बांदर काल तो अखबार मा भी पोटो ऐरी थी। किसा करड़ा सा होकै बैठ्या था।
या 'बानरतंत्र' सीरीज जारी रैणी चईये भाई।
काश उन बारह बंदरों में मैं भी एक होता तो देसी बिदेसी बंदरों के साथ खी खी करता। खी खी खी..
पंकज भैये, ये लेख तो धांसू लिख गये!हमें तो मौज आयी। अच्छा भी लगा! आनंदित भी हुये!लेकिन प्रियंकर जी की बात का मतलब समझ बालक!उनका कहना है भाषा में सस्ते शब्द से बचाव करना चाहिये। तुम उनकी बात समझो, तुमको समझदार तक कह दिया इससे ज्यादा और कोई क्या कह सकता है! प्रियकर भैया भी ऐसे सिखाते/समझाते रहें! धीरे-धीरे स्ब सीखेंगे अभी इनकी उमर ही क्या है! बंदरपने की !आदमी बनने में टाइम लगता है न!
@ श्रीश,
रे आपणा बाप को कै जावै है... लिखतो रैणो जो मन मायँ आव... जका नै जो सोचणो है सोच लै... कोनी के?
@ राग,
थोडी उछलकुद मचाया करिए आप भी बन्दर बन जाएंगे! :)
@ अनुप चाचा,
आप आनन्दित हुए, मतलब मैं सही राह पर हुँ!
और अब समझदार तक हो चुका हुँ तो भाषा की गरिमा का ध्यान तो रखना ही होगा, सो अगली पोस्ट से ऐसी गलती ना दोहराई जाएगी। वैसे खाना सिख रहा हुँ... आपकी सोहबत है..
आजकल के इंसान जानवरों का सा काम करते हैं तो सोचता हुँ मैं बन्दर ही भला!!
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