तीसरी चिट्ठी: मोनिन्दर के नाम
आदरणीय? मोनिन्दर सिंह,
निठारी, उ.प्र.
कैसे हो भाई,
आशा है कुशल मंगल होगी। अभी आप हमारे शहर के मेहमान हो। सोचता हुँ आपका स्वागत कैसे किया जाए। पान पराग तो हम खाते नहीं, वरना उसी से कर देते। हाँ, गालीयाँ बहुत खाई है...
और सुनाओ भाई, क्या हाल हैं? आजकल सेहत गिरती हुई सी लगती है। दुबले हो गए हो.. वांछित खुराक मिल नहीं रही होगी। मैं सादर माफी चाहता हुँ, आपका मनपसन्द भोज प्रदान करने में हम असमर्थ हैं। क्या करें, सभ्य होने की गलती कर चुके हैं, खाने में घास फुस ही खाते हैं।
खैर जाने दो, अपनी कहो। आजकल चुप चुप से रहते हो। कुछ बोलते नहीं। अब देखो ना हमारे डोक्टर साहब भी आपको सुला सुला कर जगाते हैं, पर फिर भी आप कुछ उगलते नहीं। बडा कठोर मन पाया है आपने। अब तो सबुत भी मिल गया हमें कि नन्हे बच्चों को रेतते हुए जी ना मचलाया होगा आपका।
पर यह क्या? इतना कठोर मन, ऐसी सेहत, फिर भी बिमार पड गए? अस्पताल में भरती हो गए? यकिन नहीं होता। क्या गुल खिला रहे हो, मासुमों का गुलशन उजाडने के बाद, उनके सपने छिनने के बाद, उनका जातीय शोषण करने के बाद। वैसे तुम बिमार ही हो। पर शारीरिक नहीं, मानसिक बिमारी है तुमको। एक ऐसी बिमारी जिसका इलाज इंसानो के पास नहीं है। वैसे भी यह बिमारी ईंसानो को होती ही कहाँ है!!
आपके चलते फिरते प्रेत जैसे नौकर के क्या हाल हैं? आँखे सूजी हुई लगी थी, सोये नहीं लगता है, या अन्यथा ले लिया लगता है। ब्रेकफास्ट में ब्रेड परोस दी होगी।
भाई मोनिन्दर, पुनर्जन्म में अपना भरोसा नहीं है, फिर भी बस यही तमन्ना है, कि तुमको जल्द से जल्द फाँसी हो जाए, और तुम्हारा पुनर्जन्म हो। तुम जन्म लो एक गरीब के घर में... पलो बढो अभाव में... और एक दिन एक दरिन्दा तुम्हे उठा ले जाए... तुम्हारा बलात्कार करे और फिर तुम्हे भूनकर खा जाए। तब तुम्हे पता चलेगा कि तुमने क्या पाप किए थे।
ज्यादा नहीं तो बस सोचकर ही देख लो। तुम्हारी बिमारी ठीक हो जाएगी। शायद!
शेष कुशल,
- पंकज

7 Comments:
अपनी चिठ्ठी में नीचे मेरा हस्ताक्षर भी शामिल कर लीजिये.
निचे हस्ताक्षर मे मेरा भी नाम शामील कर लिजीये !
That's nice.Kisi ki mansik haalat etani bhi kharaab ho sakati hai...
lekin bengani bhai mai ek baat se sahamat nahi hun...woh hai etani aasaan Maut(phanshi)...ese to mansik yatanao se maara jaana chaahiye.
नीचे मेरा हस्ताक्षर भी ले लो, बस फांसी की जगह हम तडपाने के पक्षधर हैं जिससे उसे इसी जन्म में सजा मिल जाय अगले जनम तक क्या पता ऐसे लोग क्या गुल खिला लें।
अनुरागजी, आशीषजी, तरूणजी,
आपके हस्ताक्षर भी शामिल किए गए। :)
द्वियाभजी,
मोनिन्दर जैसे लोगों के लिए कोई भी सजा छोटी ही होगी।
मात्र मोनिंदर को सजा दे देने से इसका हल निकलता नही दिखता, इसका आश्य यह नहीं कि ऐसे दरिंदो को समाज में खुला छोड़ देना चाहिये.
मोनिंदर के पिछे और भी बहुत से लोग हैं, मुझे तो यह मामला मानव अंगो की तस्करी का प्रतित होता है, सिर्फ़ मोनिंदर पर फोकस करने से उसके "बाप" इससे मुक्त होकर फिर से नया मोनिंदर ढूँढ लेंगे.
मुझे पूरा यकिं है यदि इस मामले की छानबीन पूर्ण ईमानदारी से हुई तो मोनिंदर तो मात्र एक प्यादा निकलेगा.
यह भारतीय राजनिती और राजनेताओं की मानवीय गिरावट की पराकाष्टा है. इससे शर्मनाक और क्या होगा?
आप सही कह रहे हैं, गिरीराजजी,
मोनिन्दर एक प्यादा भर ही लग रहा है। इसके पीछे बहुत बडी साजिश है... इसमे कोई शक नही
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