आज बरसी
लो जी देखते देखते (इसे लिखते लिखते पढा जाए) एक साल बीत ही गया। आजके मनहुस दिन ही हिन्दी में चिट्ठा लिखना यानि कि मंतव्य शुरू किया था। मनहुस इसलिए कि मुई चिट्ठाकारीता की लत तो गुटखे की लत से भी भारी है, और अह्हो.. आनन्दम.. आनन्दम... कराती ही रहती है!!
डरिए मत! कोई बही खाता लेकर लेखा जोखा नहीं पेश करने वाला हुँ! बस सुचित करना और, और सब लोगों का धन्यवाद करना चाहता हुँ।
एक साल में बिग बोस की रूपाली की तरह मैने ढेरों रिश्ते बनाकर अपनी पोजिशन स्ट्रोंग कर ली है! ;-)
एक प्रिय लालाजी हैं, एक जुगाडी ताऊ है, एक चाचु, एक भाईसा, एक दादा, एक परम मित्र, एक "टाइमपास" मित्र, एक "खुदाई" मित्र, एक दिल्ली का "खाता पीता मित्र" और असंख्य बन्धुजन... वाह.. अपनी तो निकल पडी!!
और हाँ, लास्ट बट नॉट द लीस्ट एक महापुरूष भी हैं।
अब दो बेहुदा पंक्तियाँ झेलो:
इतने साल मेरी सोच बिचारी युँ ही तरसी,
धन्यवाद चिट्ठाजगत, कि अब युँ "आज बरसी"।

19 Comments:
शुभकामनाऐ, आपके लेखन मे और धार आये,
इसे बरसी नहीं, जन्म दिन कहिये और जन्मदिवस की शुभकामनाएँ :-)
मनहुस इसलिए कि मुई चिट्ठाकारीता की लत तो गुटखे की लत से भी भारी है, और अह्हो.. आनन्दम.. आनन्दम... कराती ही रहती है!!
वाह पंकज भाई!!! हमें तो मालूम ही नहीं था कि यह एक लत भी है, हम तो समझ रहे थे कि यह तो आपकी लात है, जो आप कभी महापुरूषों पर, कभी मासूम बन्दरों पर तो कभी आधुनिक भारत के जनक (यह भविष्य की बात है) कहलाये जाने वाले मोनिंदर पर चलाते हैं। मात्र एक आ की मात्रा अधिक समझकर हमने आपके चिट्ठे का मतलब ही कुछ और निकाल लिया।
डरिए मत! कोई बही खाता लेकर लेखा जोखा नहीं पेश करने वाला हुँ!
अरे भाई डर कौन रहा है??? आप की पाठक???
लेखा-जोखा होगा तो पेश करेंगे ना भाई, और यह गलती कर भी मत लिजियेगा, वरना एक साथ इतने बन्दर आपके चिट्ठे पर उत्पात मचाने लगेंगे कि आपको ही चिट्ठा छोड़कर भागना पड़ेगा।
एक साल में बिग बोस की रूपाली की तरह मैने ढेरों रिश्ते बनाकर अपनी पोजिशन स्ट्रोंग कर ली है!
हाँ, भई यह तो है। आप "मोदी" से बने रिस्ते की ही बात कर रहें है ना???
एक प्रिय लालाजी हैं, एक जुगाडी ताऊ है, एक चाचु, एक भाईसा, एक दादा, एक परम मित्र, एक "टाइमपास" मित्र, एक "खुदाई" मित्र, एक दिल्ली का "खाता पीता मित्र" और असंख्य बन्धुजन... वाह.. अपनी तो निकल पडी!!
क्या निकल पड़ी भाई, ज़रा खुलकर बताइये ना! खेर आपने जो नाम लिखे वो तो वाकई में बहुत बड़े हैं। मुझे आश्चर्य हो रहा है कि ये आपके चिट्ठे में समाये कैसे?
और हाँ, लास्ट बट नॉट द लीस्ट एक महापुरूष भी हैं।
मात्र एक भाई???
अब दो बेहुदा पंक्तियाँ झेलो:
क्यों �
मनहुस इसलिए कि मुई चिट्ठाकारीता की लत तो गुटखे की लत से भी भारी है, और अह्हो.. आनन्दम.. आनन्दम... कराती ही रहती है!!
वाह पंकज भाई!!! हमें तो मालूम ही नहीं था कि यह एक लत भी है, हम तो समझ रहे थे कि यह तो आपकी लात है, जो आप कभी महापुरूषों पर, कभी मासूम बन्दरों पर तो कभी आधुनिक भारत के जनक (यह भविष्य की बात है) कहलाये जाने वाले मोनिंदर पर चलाते हैं। मात्र एक आ की मात्रा अधिक समझकर हमने आपके चिट्ठे का मतलब ही कुछ और निकाल लिया।
डरिए मत! कोई बही खाता लेकर लेखा जोखा नहीं पेश करने वाला हुँ!
अरे भाई डर कौन रहा है??? आप की पाठक???
लेखा-जोखा होगा तो पेश करेंगे ना भाई, और यह गलती कर भी मत लिजियेगा, वरना एक साथ इतने बन्दर आपके चिट्ठे पर उत्पात मचाने लगेंगे कि आपको ही चिट्ठा छोड़कर भागना पड़ेगा।
एक साल में बिग बोस की रूपाली की तरह मैने ढेरों रिश्ते बनाकर अपनी पोजिशन स्ट्रोंग कर ली है!
हाँ, भई यह तो है। आप "मोदी" से बने रिस्ते की ही बात कर रहें है ना???
एक प्रिय लालाजी हैं, एक जुगाडी ताऊ है, एक चाचु, एक भाईसा, एक दादा, एक परम मित्र, एक "टाइमपास" मित्र, एक "खुदाई" मित्र, एक दिल्ली का "खाता पीता मित्र" और असंख्य बन्धुजन... वाह.. अपनी तो निकल पडी!!
क्या निकल पड़ी भाई, ज़रा खुलकर बताइये ना! खेर आपने जो नाम लिखे वो तो वाकई में बहुत बड़े हैं। मुझे आश्चर्य हो रहा है कि ये आपके चिट्ठे में समाये कैसे?
और हाँ, लास्ट बट नॉट द लीस्ट एक महापुरूष भी हैं।
मात्र एक भाई???
अब दो बेहुदा पंक्तियाँ झेलो:
क्यों इससे पहले जो लिखी है वो बेहुदा नहीं है???
इतने साल मेरी सोच बिचारी युँ ही तरसी,
धन्यवाद चिट्ठाजगत, कि अब युँ "आज बरसी"।
इसे सोच का बरसना कहते हो?
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नोट : हालांकि मेरे द्वारा दी गई टिप्पणी मात्र पंकज भाई के लिए हैं मगर कोई भी वानर/दानव/मानव/महापुरूष/देव इस पर प्रतिक्रिया दे सकता है।
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उपर लिखा एक-एक शब्द मात्र उसी तरह है जैसे पंकज भाई के बन्दर और अनुराग जी के तरकश पर तीर, अतएवं भावनाओं को संभालें।
अब कुछ डायरेक्ट दिल से -
पंकज भाई को चिट्ठाजगत में एक वर्ष पूर्ण करने पर हार्दिक बधाई!!!
अभी कुछ दिन पहले तो जन्मदिन मनायाथा और अभी बरसी?
सुनील भाई साहब सही कह रहे हैं " इसे बरसी नहीं जन्मदिन कहिये "और वो भी पहला सो पहला तो खास होता है।
पहले ज्नम्दिन की ढ़ेरों बधाईयाँ और प्रार्थना करते हैं कि आपकी कलम (या की बोर्ड) की धार और पैनी हो।
चिट्ठे के जन्मदिन की बधाई
भई अगर बरसी मना रहे हो तो पंडितो को भोज करवाओ और शांति पाठ करवाओ। हमारी संवेदनाए साथ है।
और यदि जन्मदिन मना रहे हो तो केक काटो, खुशी मनाओ, मौज करो, ब्लॉग लिखो, बढ चढ कर लिखो, अब एक साल पुराने हो गए हो तो गम्भीरता से लिखो। बहुत बहुत बधाई।
ओह1 अब इस बरसी का राज समझ मे आया। तभी आज सुबह आप चुप रहे, जब मैने चैट रुम मे पूछा, "किसकी बरसी"। बरसी उर्फ़ जन्मदिन मुबारक।
पंकज
वाह, बड़ी जल्दी एक साल के हो गये. अभी तो लोगों ने तुम्हारा बालपन, अल्हड़ता- चिट्ठाजगत परिवार ने एन्जवाय करना शुरु ही किया और तुम बड़े भी हो गये. :)
मगर यही जिन्दगी है, बच्चे हमेशा बच्चे नहीं रहते. बड़े होने की हार्दिक बधाई और सुखद भविष्य के लिये शुभकामनायें. अब वरिष्ट चिट्ठाकारी शुरु करें और सबको यूँ ही प्रसन्न करते रहें अपने लेखन से. कविता तो अच्छी करने ही लगे हो-लगे रहो. :)
पुनः बधाई और शुभकामनायें.
@ प्रमेन्द्र
धन्यवाद.
@ सुनिलजी,
बरसी शब्द मजाक मे लिखा है, धन्यवाद
@ गिरीराज भाई,
अच्छा मजाक है. धन्यवाद
@ सागर भाईसा,
अब और क्या पैना करूं... जो भी है यही है.. बस :)
@ ताऊ,
धन्यवाद, भाई गम्भीरता से लिखना क्या होता है? आप मेरी स्टाइल मारना चाहते हो? चलो ठीक है कोशीश करता हुँ.. आप लोगों जैसा ही लिखुँ
@ उन्मुक्तजी, टंडनजी,
धन्यवाद
@ लालाजी,
ह्म्म्म.. तो बच्चे को बडा हुआ जाए? ऐसा.
बधाई और शत-शत शुभकामनायें !
भईया, जरा आजकल नया चिट्ठा सैट करने में व्यस्त हूँ, इसलिए ज्यादा तो लिखूँगा नहीं। पर हमारी शुभकामनाएं लेनी ही पड़ेंगी। अमां यार तुम दोनों भाई अजीब शुभकामनाओं के मौकों पर भी अजीब-अजीब बोलते हो। (संजय भाई को जन्मदिन की शुभकामना पसंद नहीं)।
हम तो हक से देंगें 'शुभकामना' हाँ। :)
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