8.3.06

कल रात फिर धरा हिली थी

समय था रात के 11:53. मैं नींद की बाहों में समाया ही था कि मेरी पत्नी ने सारा मज़ा किरकिरा कर दिया. मुझे नींद से उठाकर कहने लगी “पावँ क्यों इतनी जोर जोर से हिला रहे हो.” अब मैं कहाँ पावँ हिला रहा था. मैने कहा “क्या यार क्यों डिस्टर्ब कर रही हो, पाँव कँहा हिला रहा हुँ” तब वो चौंकी. तो क्या ये भूकम्प आ रहा है? अब हडबडाने की बारी मेरी थी. सारी नींद एक बार में ही उड गई. मैं एक सेकंड में खडा हो गया. बीवी के साथ बेडरूम से बाहर दौडा, तब तक सब जाग चुके थे. धरती का हिलना बस बंद ही हुआ था.

मेरी अनुज बहन बोली, भूकम्प था ना? हाँ भई, भूकम्प ही था. चलो घर से बाहर चलें. नहीं, भाग नहीं रहे हैं, क्योंकि कुछ गिरना वगैरह होता तो अब तक हो चुका होता. पर क्या है कि नींद थोडे ही आएगी. घर से निकला तो पडोसी बोले “भूकम्प था ना?” हाँ जी, भूकम्प ही था, बोलो क्या करें? हम थोडा सीढीयों मे खडे हुए तो अचानक धडधड की आवाज़ आई. नहीं, फिर से भूकम्प नहीं आया था. वो तो पडोसन भागी थी. सरकार की नज़र क्यों नहीं पडी. वरना ओलम्पिक मे भेज देते तो, स्वर्ण पदक मिल जाता.

अब हम सोच रहे थे कि कोई कुशल मंगल का फोन क्यों नहीं आया. घर में जाकर फोन देखा तो डेड हो गया था, थोडी देर मे चालु भी हो गया था अलबत्ता. इतने मे डोरबेल बजी तो देखा, मामाजी खडे है, मामाजी क्या है दोस्त ही समझो. मुझसे सालभर ही तो बडा है. बोला “खैरियत से हैं ना, भूकम्प आया था ना?” अब हम क्या कहें, हाँ जी भूकम्प ही लगता था. आगे बोले “चलो”. मैने कहा – कहाँ? बोले - “सैर कर आते है” लो अब आधी रात को सैर! पर टाईम टाईम की बात है. भूकम्प क्या आया, लोगों को घुमने फिरने का – मटरगस्ती करने का बहाना मिल गया. वैसे भी हम गुजराती लोग घुमने फिरने के ज़रा शौकिन रहे है.

तो भई हम सडकों पर निकले तो देखा लोग-बाग दुपहिआ हो या चारपहिआ कुछ भी लिए बस घुमे जा रहे है. कोई कहे “अरे न्यूज़ लगाओ, कुछ आया क्या?” कोई कहे “ऐसे तो बहुत देखें हैं” कोई डरा हुआ, कोई डरकर भी तोप बना हुआ.

इस बीच किसी की चाँदी हुई तो वो थे पान गल्ले वाले. क्या रौनक हो गई वहाँ तो. महफील जमा हो गई. तरह तरह के कयास लगने लगे. “मै तो कहता ही था” “देखा नहीं शाम से मौसम कैसा हो गया था” “क्या हिला था यार”.

अब कई समझदार लोग भी पैदा हो गए. “मै तो कहता ही था. हाईराईज़ बिल्डिंग मे एपार्टमेंट लेना ही नहीं चाहिए, बंगला ही अच्छा.” “कोई कहे अरे कुछ नही यार, ऐसा रोज रोज नही होता” बस बहस शुरू.

रात दो बजे तक घर पहुँचा. थोडा डर कर ही सही, निंद तो लेनी ही पडी. आखिर सुबह आफिस जाना है.
फिर वही सुबह, फिर वही काम, फिर वही ओफिस, फिर वही भूकम्प..... ना ना यार शुभ शुभ बोलो.

(भूकम्प की तीव्रता 5.2 थी. कोई जानमाल का नुकशान नहीं)

2 Comments:

Blogger Pratik Pandey said...

इस भूकम्प की ख़बर तो किसी समाचार चैनल ने प्रसारित ही नहीं की। इसलिये इसके बारे में कुछ भी पता नहीं चला।

11:11 PM, March 08, 2006  
Blogger renu ahuja said...

नमस्कार,
चलो आशावादी विचारों को देखें तो इत्ना ही सही कि
कुछ आया ही था, गया तो नहीं. और रही बात तीव्र्ता की तो हम कहेंगे की रिक्ट्र स्केल का तो वो ही जाने, पर आप्की लेखनी की तीव्र्ता भी कम नही, की मौका मिला और लिख ड़ाला, चाहे भुकंप ही मुद्दा क्यों ना हो, य्ही है एक लेख्क की पह्चान.

9:59 PM, March 10, 2006  

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