मै, ब्लोगजगत और एक संयोग
कल थोडा अपसेट था. हो जाता हुँ कभी कभी. रात को लेटे लेटे कुछ ना कुछ सोचे जा रहा था. फिर ब्लोगजगत के बारे में सोचने लगा. मेरा इस तरफ अनायास ही आना हो गया. या युँ कहुँ कि एक छोटा सा संयोग ही था. सचमुच कभी कभी छोटी छोटी घटनाएँ भी कितना फर्क ला देती है.
हम ब्लोगजगत से एकदम कटे हुए थे. ऐसा नही है कि नेट सेवी नही थे. वो तो थे. मै गुगल ग्रुप, याहु ग्रुप से वाकिफ भी था. पर मुझे वो सब अच्छा नही लगता था. सोचता था ये सब निठ्ठले लोगों का टाइमपास का तरीका है. हमे ब्लोगजगत की तरफ खिंचने का श्रेय अगर किसीको जाता है तो वो है मेरा मित्र रवि कामदार.
मेरी रवि से मुलाकात सडक पर हुई थी. हम युंही टकरा गये थे. और बस एक सफर शुरू हो गया. आज सोचता हुँ अगर उस दिन मै एक मिनट भी देरी से चला होता तो रवि से ना टकराता, ना ही उससे कभी मिल पाता और ना ही आज ये लिख रहा होता. सब संयोग ही तो है.
रवि ने ब्लोग के बारे मे बताया, फीड क्या होती है बताया. फिर हमारा सफर शुरू हुआ. विस्तार से तो क्या बताऊ आप बोर हो जाओगे. खैर, हममे से सबसे पहले भ्राताश्री ने लिखना शुरू किया. उनका ब्लोग जोगलिखी को देखकर मैने अपना अंग्रेजी ब्लोग शुरू किया. रवि तो अंग्रेजी मे पहले से ही लिखता था. फिर एक दिन इच्छा हुई कि क्यो ना मै भी हिन्दी मे लिखु. भैया ने काफी प्रोत्साहित किया. और बस मंतव्य शुरू हो गया, और कुछ दिनो मे तत्वज्ञानी के हथौडे भी पडने लगे.
फिर भैया ने सोचा कि क्यो ना हमारा एक कोमन प्लेटफोर्म हो. जहाँ पर सभी ब्लोग हो. और ऐसे जन्म हुआ तरकश का.
शुरू मे हमारा विचार था कि तरकश पर हम, तीनो के हिन्दी ब्लोग रखेंगे. पर धीरे धीरे नये नये ब्लोग जुडते ही चले गये और तरकश एक समृद्ध नेटवर्क बन गया. आज तरकश पर हमारे पाँच हिन्दी ब्लोग (जोगलिखी, मंतव्य, तत्वज्ञानी के हथौडे, टेक्नोलोजी का तत्वज्ञान, पहेली), दो अंग्रेजी ब्लोग, दो गुजराती ब्लोग, एक फोटोब्लोग, एक हिन्दी पोडकास्ट, और एक "नारद" जैसी ही गुजराती ब्लोगो की फीड एग्रीगेट साइट (ओटलो) है.
और भी कई नये ब्लोग जुडने वाले है, जैसे कि रवि का गुजराती ब्लोग, खुशी का ब्लोग, अभिजीत का ब्लोग वगैरह....
ओटलो शुरू करने के पीछे हमारी मंशा गुजराती चिट्ठाजगत को समृद्ध बनाने मे योगदान देना है. इस साईट के माध्यम से लोग आसानी से जान पाएंगे कि गुजराती चिट्ठाजगत मे क्या कुछ नया है. इसको बनाने मे जितुजी की सहायता के प्रति हम हमेशा आभारी रहेंगे.
हिन्दी चिट्ठाजगत मे आने का दुसरा यह भी लाभ हुआ कि हम व्यवसायिक दृष्टि से भी हिन्दी का महत्तम उपयोग करने की सोचने लगे. हमारी कम्पनी की वेबसाइट के हिन्दीकरण का काम चल ही रहा है. इसके अलावा हम अपने कई क्लाइंटो की वेबसाईटो के कुछ भाग हिन्दी मे भी अनुवादित कर रहे है.
हमारा सफर और जितना हो सके उतना योगदान जारी रहेगा.

4 Comments:
अच्छा लगा जानकर। पंकज भाई, हम लोग यहाँ एक परिवार की तरह ही है। एक परिवार की तरह रहने से जो अपनेपन का एहसास होता है उसका तो मजा ही कुछ अलग है। आपका हिन्दी चिट्ठाकारों के इस परिवार मे हार्दिक स्वागत है।
आप ग्राफिक्स मे मास्टर हो,वो आपके कार्यों मे झलकता है,अपनी इस कला को थोड़ा बहुत हिन्दी चिट्ठाकारी के लिये भी प्रयोग करो भई। हमारे यहाँ ग्राफिक्स डिजाइनर की बहुत किल्लत है।
मैं यह पहले कह नहीं पाया पर तरकश का रुप बहुत ही सुंदर है, पर मेरे विवार से तरकश समूह ब्लॉग नहीं ब्लॉग नेटवर्क है, यहाँ तुमने इस शब्द का प्रयोग पहली बार, पर सही किया।
गुजराती ब्लॉग अन्वेषक के विचार बेहद बढ़िया है। शायद तुम जानते होगे कि चिट्ठा विश्व पर भी गुजराती ब्लॉग का विभाग है, मुझे खुशी होगी यदि तुम्हारा समूह समय समय पर नये जुजराती चिट्ठों की जानकारी मुझे भी दे सके ताकी यह जानकारी चिवि के पाठकों को भी लाभान्वित कर सके।
मेरी शुभकामनाएँ!
पंकज भई,
बढिया ही पोस्ट है यह। आपको हिन्दी चिट्ठाजगत से बहुत प्यार ही है और लगता है मुझे कि इस दुनिया में प्रवेश करने आपका जिवन को मोड़ दिया है। लेकिन यह हुअ क्यों और आप क्योंकर हिन्दी चिट्ठा लिखते रहते हैं? आर भी सवाल है कि जब आप लिख रहे हैं तो किसके लिए है आपकी लेखक? या क्या वह सच मन में न आती है?
कभी कभी कुछ संयोग जीवन में एक बड़े बदलाव का कारण बनते है, आपके साथ भी हुआ, पहले ब्लाग फ़िर 'तरकश' बस यूं समझ लीजिए की आज तरकश है तो कल को सर्जनता की प्र्त्यंचा पर अमर रचनाओं का संधान भी होगा, आज कंपनी के लिए यदी हिंदी साइट के अनुवाद का काम हुआ तो कल को काय्र्क्शमता के उच्चतम मान्दंड़ विकसित कर पाने का श्रेय भि....यही है संयोग और ज़िंदगी!
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