18.4.06

सरदार सरोवर पर मैं

इन दिनों सरदार सरोवर नर्मदा बांध का मुद्दा सुर्खियों पर छाया रहा. गुजरात की जीवनरेखा समान यह परियोजना लोगों को हमेंशा से आकर्शित करती आई है. 1998 में समाप्त होने वाली यह परियोजना सरकारी लालफितासाही के चलते तथा नर्मदा विरोधीयों की राजनिति के चलते ना जाने कितने साल पिछड गई है. वैसे इसकी उपयोगिता कोई तभी समझ सकता है जब वो गुजरात में आता है. गुजरात के कच्छ तथा सौराष्ट्र के लोगों के लिए तो यह जीने मरने का मसला है. सरदार पटेल का स्वप्न नर्मदा बांध ना केवल उपयोगी है वरन एक अच्छा पर्यटन स्थल भी है. मैं एक साल पहले गया था वहाँ.

अहमदाबाद से वडोदरा, एक्स्प्रेस वे के द्वारा करीब एक घंटे में पहुँचा जा सकता है. वहाँ से मध्यप्रदेश की तरफ एक सडक निकलती है, जो सीधे केवडीया कोलोनी जाती है. हम बस में सवार थे. पुरी जमात साथ थी और पिकनीक की बात थी. अहमदाबाद से वडोदरा जितने मजे में आए, उतना मज़ा आगे ना आना था. क्योंकि अब छोटी सडक है. खैर इस बीच मैने तो एकाध झपकी मार ली, क्योंकि सुबह जल्दी उठे थे. यही अच्छा समय होता है यहाँ आने का, एकदम सुबह सुबह घर से निकलो. जैसे जैसे केवडीया कोलोनी नजदीक आती गई, मन की उत्कंठा बढती चली गई. नर्मदा बांध को देखने की तीव्र इच्छा. कैसा लगता होगा देखने में? यही सोच रहा था. तभी एक ढाबा आया और एक साहब जलपान तथा लघुशंका निवारण को व्यथीत हो गए. धत अब और लेट होगी.

खैर वहाँ से निकले तो सामने डांग की पर्वतश्रँखला दिखाई देने लगी. क्या मौसम हो गया था. कहाँ गुजरात की गर्मी... लगता ही नहीं कि हम अभी भी गुजरात में ही थे. बस पहाड पर चढने लगी, और थोडी देर बाद हम केवडीया कोलोनी पहुँच गए. वहाँ रजिस्टर पर हमारा नाम, पता, कहाँ से आए और क्यों आए वगैरह लिखा गया. और हम निकल पडे मंज़िल की ओर. हाथ में एक निर्देशिका भी आ गई थी.

मैने नक्शे पर नज़र डाली तो अब बान्ध दिखाई देने ही वाला था. मैनें कहा, सब लोग इधर देखो, बाँई ओर... और सब देखने लगे उत्सुकता से. एक छोटा सा पहाड था हमारे आगे जो धीरे धीरे पीछे सरक रहा था, क्योंकी बस आगे जा रही थी. और बस तभी जोर से झर-झर की आवाज़ सुनाई देने लगी..जैसे गरज के साथ बारीश हो रही हो. और हमें पहाड के पीछे से बांध की झलक दिखाई दी. कितना आलौकिक दृश्य था वो!! मैं बस अभीभूत होकर निहारता ही रहा और एक दुसरा पहाड बीच में आ गया.
(क्रमश:)

4 Comments:

Blogger Udan Tashtari said...

आपने मेरी गुजरात घूमने की इच्छा बहुत बड़ा दी है, लगता है इस बार भारत आने पर गुजरात आना ही पडेगा.
तब तक आपके ब्लाग के माध्यम से ही घूमते हैं.
समीर लाल

8:49 PM, April 18, 2006  
Blogger Jitendra Chaudhary said...

सरदार सरोवर, सच मे गुजरात के लोगों के लिये जीवन मरण का मुद्दा है।मै गुजरात का लगभग काफ़ी हिस्सा घूमा हूँ, मैने पानी की किल्लत देखी है,चाहे बड़ोदरा,राजकोट,जैतपुर,जूनागढ हो या जामनगर,भावनगर या कच्छ का रण।बिना पानी के प्यासे गुजरात का विकास अधूरा है।इस बांध का पानी पहुँचने तो दीजिए, फ़िर देखिये गुजरात की विकास दर। लेकिन विकास के सामने तुच्छ राजनीति आड़े आ जाती है। मै पक्ष और विपक्ष के विवाद मे नही पड़ना चाहता, लेकिन बस इतना ही कहना चाहता हूँ, विकास के मसले को राजनीति से दूर रखो।

11:56 PM, April 18, 2006  
Blogger Udan Tashtari said...

पंकज भाई
तीनों दिवारें मिल कर एक हिस्सा ही बना रहीं हैं..खैर आपने इतनी उत्सुकता बड़ा दी है, तो अब मेहमान नवाजी के लिये तैयार रहिये..वैसे भी बहुत दिन हो गये असली गुजराती खाना खाये..बहुत समय पहले, सुरत स्टेशन के पास बडी फ़ेमस जगह पर गुजराती थाली खाई थी, अब तक स्वाद जिंदा है..मगर होटल का नाम याद नही...तो फ़िर तैयार रहिये पंकज और संजय भाई, दो बार का तो इंतजाम हो गया लगता है......
सादर
समीर लाल

6:55 AM, April 20, 2006  
Blogger पंकज बेंगाणी said...

स्वागत है कुंडलीकारजी.

मेहमाननवाज़ी में कमी नहीं आएगी.

तमारी वाट जोईने बैठा छीए. भले पधारो.

10:25 AM, April 20, 2006  

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