15.4.06

वो दिन जो पीछे छूट गये

कल रात युहीं बैठा बैठा मेरे सिस्टम की कुछ पुरानी फाइलें देख रहा था. तभी अचानक एक बहुत पुराने फोल्डर तक पहुँच गया. उसे खोलने पर मेरी पुरानी यादें फिर से ताज़ा हो गई.

जब मैं विद्यार्थी था. हम ग्राफिक डिजाईनिंग सिखते थे. उस फोल्डर मेरे विद्यार्थीकाल की बनाई हुइ तस्वीरें तथा ग्राफिक्स मिले. सोचता हुँ, क्या दिन थे वो भी. रात को 11-12 बजे तक हमारा गुट काम करता था, फिर किटली पर चाय पीने जाते थे. नई नई चीजे बनाते थे. मैने 19 साल की उम्र में मल्टीमिडिया इंस्टीट्युट मे दाखिला लिया था.

कोलेज की पढाई में तो कभी मन लगा ही नहीं था. हर समय डिजाइन, ग्राफिक्स और विज्ञापनों में खोया रहता था. 20 साल की उम्र में मुझे उसी इन्स्टीट्युट में मास्साब बना दिया गया. बहुत खुश हुआ था उस दिन... पढाई पुरी हुई भी नही थी, मास्साब बन गया. 2 साल बाद मेरी पदोन्नती हुई और मै टेक्नीकल हेड बना. उसके 1 साल बाद मैने नौकरी छोड दी.

वो दिन भी याद है, बडा कठोर निर्णय था. अच्छी खाशी पगार को छोड व्यापार में आना वो भी तब जब व्यापार एकदम नई सांसे ले रहा हो आसान तो नहीं ही हो सकता. पर मैं थक चुका था, इंस्टीट्युट की अंदरूनी राजनिती से. मैने भैया से कहा "छोड दुँ?" उन्होने कहा "छोड दे". बस छोड दी.

छवि के शुरूआती दिन याद करने को मन नही करता. लेकिन आज लगता है वो निर्णय सही था.

उन दिनों मे मेरे पास फुर्सत के कुछ क्षण होते थे, और मै कुछ ना कुछ बनाता रहता था. उन दिनों मे मै सुबह 5.30 बजे उठता था, 6.15 की बस पकड कर इंस्टीट्युट जाता था, वहाँ से निकलने का कोई समय निर्धारीत नही होता था, फिर हमारे साइबर केफे जाता था (ये भी हुआ करता था कभी), फिर रात को 12-1 बजे घर. घर तो लगभग बेहोशी की हालत में ही जाता था. :-)

छोडिये...... ये दिखिए- उन दिनो में बनाए गए कुछ 3D चित्र. आपको कैसे लगे बताइगा.














ये चित्र मैने 3D Studio Max सोफ्टवेर में बनाए थे.

5 Comments:

Blogger Udan Tashtari said...

कहते हैं:

पूत के पांव पालने मे ही दिख जाते हैं...यही मुहावरा चरितार्थ कर रही हैं आपकी कृतियां.

समीर लाल

10:10 PM, April 15, 2006  
Blogger मिर्ची सेठ said...

मेरी पसंद आखिरी वाला चित्र। क्या सपने ले रहे थे पंकज भाई यह चित्र बनाते हुए।

आरक्षण बंद बैज पर एक सुझाव - मैं की शुरुआत बैज के ऊपरी मध्य सिरे से प्रारंभ करें। हमारी आँखे वहीं से पढ़ना आरंभ करती हैं। अभी नीचें बाएं में होने से आँख घूमाना पड़ता है

12:54 AM, April 16, 2006  
Blogger संजय बेंगाणी said...

सेठजी पंकजभाई ने पहले ऊपरी मध्य सिरे से ही प्रारंभ किया था, पर मैने सुझाव दिया कि यह देखने में उल्टा लगता हैं. वाक्य लम्बा होने के कारण यह समस्या आ रही हैं. आगे मास्साब जो सही समझे करे.

7:16 PM, April 16, 2006  
Anonymous Anonymous said...

लगो ना कि दूसरो फोटू 3D Max में बनो हो!!

मेरी पसंद आखिरी वाला चित्र।
हाँ, पसन्द तो म्हारे को भी वोई आयो है, घणों चौखो फ़ोटू होवो!! :D

4:40 AM, April 17, 2006  
Blogger पंकज बेंगाणी said...

समीरजी, पूत के आगे "स" लगाऊँ कि "क". :-)

सेठसाहब, सपनों का तो क्या है, वो उम्र ही ऐसी होती है... बडे हसीन हसीन ख्वाब आते हैं. सच्चाई तो बाद में पता चलती है.

अमित, मन्न भी कोनी लाग्यो हो कि ओ दुसरो फोटु मं 3D में ही बनायो हुँ. पण भरोसो तो करणो पडसी.

थाँ सगळां रो धन्यवाद.

9:35 AM, April 17, 2006  

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